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Wednesday, February 10, 2021

मनुष्य और बाज़ार

घातक है बाज़ार का वर्चस्व
बाज़ार हमारी ज़रूरत पूरी करे
ना कि हम बाज़ार की 

हम होते जा रहे हैं
बाज़ार की ज़रूरत
बाज़ार के सहारे छोड़ दिया है
सब कुछ, रिश्ते भी
हम सब सामान हो गए हैं
बिक रहे हैं, बिना हमारे जाने 
हमें लगता है
हम बाज़ार जाते हैं
सामान व सुविधाएँ ख़रीदने
वास्तविकता में तो हम बिक रहे होते हैं
बाज़ार में

बाज़ार घुस आया है
हमारे घरों के भीतर
और हम ख़ुशी-ख़ुशी उसका
कर रहे हैं स्वागत
हमें काफ़ी कुछ मुफ़्त में दिया जा रहा है
और हम उत्साह में, उन्माद में
उसे सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं
बिना यह जाने
कि जब कभी, कुछ भी, होता है, मुफ़्त 
तो हम सामान हो जाते हैं
उन सभी कम्पनियों के लिए
जो कर रही होती हैं 
हमारी भूख का व्यापार 
और मुफ़्त का उन्माद 
बंद कर देता है
हमारी आँखें
हमारा दिमाग़
और यह सब 
दिशा देने लगता है
हमारी मनोवृत्ति को 
और मुफ़्त से बनी मनोवृत्ति
नियंत्रित करती है
हमारी मानसिकता
हम और गरीब होते जाते हैं
अपनी सोच में

बाज़ार हमें एक ना एक नशे का
कर रहा होता है आदी
और हम बिक रहे होते हैं
सामान की तरह
सुविधाओं के रूप में
हर घड़ी, 
हर लेन-देन, 
हर सौदे के साथ

बहुत घातक है
बाज़ार का प्रवेश
हमारी निजी ज़िंदगी में
घातक है बाज़ार का वर्चस्व
समाज पर
मानवता पर

कम्पनियों के बंद होने से
नहीं बंद होता है बाज़ार
क्योंकि उनकी भूख बंद नहीं होती
वह भूख, जिसका कोई अंत नहीं है
बदल जाता है
उन कम्पनियों का नाम और निशान (लोगो)
कभी कभी मालिक भी

सब कुछ सुचारु रूप से चलने के लिए
मात्र ज़रूरतों को पूरा करने के लिए
होना चाहिए बाज़ार
और व्यक्ति को करना चाहिए
ज़रूरतों का निर्धारण, स्वयं
ना कि बाज़ार को
(जैसा आज हो रहा है)

बहुत घातक है 
बाज़ार का वर्चस्व
जहां बाज़ार हमारी ज़रूरतों का निर्धारण करे
यही परिस्थिति
हमें बना देती है सामान
बाज़ार में बिकने वाला सामान
और आदमी 
बाज़ार हो जाता है

बहुत ख़तरनाक है
आदमी का
मनुष्य का
बाज़ार हो जाना

उतना घातक नहीं है
चाइना का बाज़ार में होना
जितना उसका बाज़ार के माध्यम से
हमारे जीवन में घुसना
जो हमको सस्ता बना रहा है
मूल्यों में भी
और मानसिकता में भी

लाइक्स, सब्सक्रिप्शन और कॉमेंट
पर निर्भर बाज़ार
कर रहा है कमज़ोर
सामाजिक ढाँचे को
प्रशंसा का व्यापार हो रहा है यहाँ
कितनी बाज़ारू हो गई है
पसंद-नापसंद
यही है
मनुष्य का बाज़ार हो जाना

टीआरपी से मापा जा रहा है
विज्ञापनों का मूल्य
और विज्ञापनों के बल ही
चल रहे हैं चैनल
जो हमारी सोच पर हो रहे हैं हावी
सब कुछ परोसा जा रहा है
भूख बड़ाई जा रही है
ज़बरदस्ती, सुचारु रूप से  
और उसे बताया जा रहा है
माँग में संशोधन की प्रक्रिया
उधारी से बढ़ाया जा रहा है
पूर्ति को,
औद्योगिक व व्यावसायिक गतिविधियाँ
ऋण केंद्रित होती जा रही हैं
और गगनचुंबी कार्यालयों में
गुणा-गणित चल रही है

समाचारों का बाज़ार है
जहां बाज़ार का समाचार
पीछे छूट गया दिखता है
न्यूज़ चैनल धीरे-धीरे
व्यूज़ चैनल बनते जा रहे हैं
निष्ठा बिक रही है
सत्ता और सत्तू दोनों
बाज़ार में हैं
विज्ञापन, समाचार और बाज़ार
सब टीआरपी नियंत्रित कर रही है
और टीआरपी बिक रही है
ख़रीदी जा रही है

बाज़ार में
भाव का निर्धारण
भावनाएँ कर रही हैं
और मानवीय भावनाओं से
खेला जा रहा है
खुलेआम
भावनाओं का हो रहा है
व्यापार
और मदारी बना बाज़ार
मनुष्य को 
बंदर की तरह 
अपनी ढपली की धुन पर
नचा रहा है

कहाँ है स्वतंत्र बाज़ार
कौन स्वतंत्र है
इस बाज़ार में
विकल्पों की उपलब्धता की आड़ में
फ़्रीट्रेड का बनाया जा रहा है मज़ाक़
और पूंजीवाद की सार्वभौमिकता
की पूजा की जा रही है

व्यवस्था
विपणन से विघटन की ओर जा रही है
और मौद्रिक मूल्यों द्वारा प्रदर्शित प्रगति
एवं आर्थिक विकास में लिप्त नीतियाँ
दूर ले जा रही हैं 
व्यक्ति की सोच को
मानवीय मूल्यों से

सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी 
मानो ऐसा मापक हो गया हो
जिसके अभाव में
विकास की परिकल्पना अधूरी हो
भलीभाँति यह जानते हुए कि
जीडीपी और असमानता का सहसंबंध
बहुत पुराना है
सबकुछ अर्थ-केंद्रित
जीडीपी केंद्रित
क्यों हो रहा है

जीडीपी 
विलियम पेटी, एडम स्मिथ और   
साइमन कुजनेट्स 
के माध्यम से यहाँ तक पहुंचते-पहुंचते
अपने मूल रास्ते से 
भटक गई सी प्रतीत होती है  

गरीब की ग़रीबी
और अमीर की अमीरी
जीडीपी केंद्रित नीतियों
का ही परिणाम है, जो
श्रम, तकनीक व उत्पादकता
से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है

बाज़ारवाद पूँजीवाद के साथ बैठा
मना रहा है, अठखेलियाँ
और समाजवाद कराह रहा है
समष्टिवाद पर व्यक्तिवाद
हावी हो रहा है
बदल रही हैं परिभाषाएँ
बाज़ार व वाणिज्य की
सम्बन्धों का बाज़ारीकरण हो रहा है
और गणकों, माणकों व मापकों में
लिप्त बाज़ार
सामाजिक सम्बन्धों को मज़बूत
करने की जगह
मजबूर होने की बन रहा है
वजह

कई बार लगता है
कहीं कोरोना
इस बाज़ारवाद की उत्पत्ति तो नहीं
अपने नियंत्रण को 
और अधिक बढ़ाने की लड़ाई
वर्चस्व बनाने व जताने की लड़ाई
जहां मनुष्य का जीवन दांव पर हो
जहां राष्ट्रों की लड़ाई
अर्थ-केंद्रित हो
और सब कुछ
बाज़ार के इर्दगिर्द निर्धारित हो
वहाँ कुछ भी सम्भव है

बाज़ार का वर्चस्व
ख़तरनाक होते हुए भी
सबको लुभा रहा है
भविष्य को 
और घातक बना रहा है
और सुद्रढ़ सा दिखा रहा है

दिखना, दिखाना और होना
सब बाज़ार केंद्रित हो गया लगता है

हेगेल के ईश्वर पर आज भी
नित्शे हंस रहे हैं
सात्रे मुस्करा रहे हैं
और
नोम चोम्सकी
शक्तिशाली पूँजीवादी व्यवस्था पर
कटाक्ष कर रहे हैं
उत्तर आधुनिक व्यक्तिवादी सोच
समष्टिवाद पर हावी हो रही है
और बाज़ार से निर्मित
पूँजीपति
आज भी उठा रहे हैं फ़ायदा
मज़दूर की मजबूरी का
बाहर की मज़बूती
अंदर की कमजोरी
को और बड़ा रही है

मुझे अकबर इलाहाबादी याद
आ रहे हैं
दुनिया में हूँ 
दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ 
ख़रीदार नहीं हूँ

बाज़ार
बसुधैव कुटुम्बकम् पर आधारित 
समष्टिबाद की
खोद रहा है जड़ें
और न जाने कैसी
उर्वरक यूरिया
इन जड़ों में डाली जा रही है
अच्छी फसल के
बाज़ारू आश्वासनों में सराबोर
आँख मींचे, दांत भींचे
सब कुछ देख रहे हैं
जैसे हमनें देखा है
हरित क्रांति को 
और देख रहे हैं 
उसके दीर्घकालिक प्रभावों को  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता
कृत्रिम तकनीक
कृत्रिम मानव
प्लास्टिक करन्सी
प्लास्टिक मुस्कान
कृत्रिम बाज़ार
कृत्रिम माँग

कृत्रिमता में
घोर रूप से घिरा मनुष्य
कितनी दूर जा रहा है
वास्तविकता व स्वाभाविकता से 
अत्यंत कठिन है
इसकी गणना कर पाना 
सभी मापकों से परे है
इसका गणित

कृत्रिमता के जाल में फ़ंसा मानव
अपनी जड़ों से हो रहा है दूर
और स्वयं से कर रहा है
पलायन
खुद का खुद से पलायन
उसकी ख़ुद्दारी पर
एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रहा है
और यह
एक भयावह भविष्य 
के दे रहा है संकेत 

बाज़ार पूरी तरह मनुष्य में 
कर चुका है प्रवेश
मनुष्य बाज़ारमय हो रहा है
यक़ीन कीजिए
बहुत ख़तरनाक है
आदमी का
बाज़ार हो जाना

Thursday, May 21, 2020

एक नई शुरुआत

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

कहाँ से कहाँ आ गए हम
वहाँ से यहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

चार चूड़ी वाली कार को देखता हूँ
जिस पर कुत्ते बैठ रहे हैं
कुत्ते सड़क के शेर हो गए हैं
और हम बन गए हैं घर घुस्सू कुत्ते बिल्ली

घर से बाहर निकलता हूँ
तो पहले मुखौटा लगाता हूँ
एक के ऊपर एक और
मुखौटों को घर पर बनाया जा रहा है
रंग - आकार - प्रकार के अनुसार

बंद हैं, मंदिर - मस्जिद 
मगर शराब की दुकानों के बाहर
बेशुमार भीड़ है
सरकार भी कुछ ऐसा ही चाहती दिखती है

क़ैदी छोड़े जा रहे हैं जेलों से
और नए प्रकार के जेल बनाए जा रहे हैं
पुलिसवाले सड़कों पर खाना बाँट रहे हैं
अर्धसैनिक बल शराबियों को
सीधी लाइन में 
सफेद गोले के भीतर रखने में व्यस्त हैं
और तो और
वे इस प्रक्रिया में संकृमित होकर
अस्पतालों में भरती होने पर विवश हो रहे हैं
कहीं-कहीं पुलिस वाले ताली बजा रहे हैं

डॉक्टर अस्पताल से घर की जगह
होटल में जा रहे हैं
डॉक्टर अस्पतालों में भर्ती भी हो रहे हैं
अस्पताल कर्मी माँ अपने बच्चे से मिल नहीं पा रही है

सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता
कुछ कुछ एक सा बोल रहे हैं
नेता जनता को इकट्ठा होने से मना कर रहे हैं

मज़दूर अपने घर, अपने देस, अपने गाँव लौट रहे हैं
जान की परवाह किए बग़ैर
पैदल, साइकिल पर, रिक्शे पर, ठेले पर, टेम्पो से, टैंकर में भरकर
हर क़ीमत पर, किसी भी तरह
वे घर, अपनों के बीच जाने को आतुर हैं
जान की परवाह किए बगैर
उनकी इस व्याकुलता के समक्ष
भूख ने भी घुटने टेक दिए लगते हैं

अनाज, फल, साग-सब्जी
सब गाँव से आता है
मज़दूर भी
और इन मजदूरों के कंधों पर लदा कोरोना
शहर से गाँव जा रहा है

हम सब भी
कभी ना कभी
किसी न किसी गाँव से क़स्बे में
क़स्बे से नगर और फिर महानगर में
आए थे

पार्क. बाज़ार, सड़क,
स्कूल, कालिज, पुस्तकालय
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
पसरा है सन्नाटा
और घरों में रह रही है रौनक़

यह कैसी बेमौसम बरसात है
उल्टी गंगा बह रही है
सूरज पूरव से उगकर
पश्चिम के रास्ते
फिर पूरव की ओर आ रहा है

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

नीला आकाश दिखाई दे रहा है
पर्वत चोटियाँ साफ लग रही हैं
नई-नई दिखने वाली
विलुप्त होती दुर्लभ चिड़ियाँ दिखाई दे रही हैं
जानवर शहरों में प्रवेश कर रहे हैं

चीन मे बने मोबाइल फ़ोन से
चीन की बुराई हो रही है
विश्वशक्ति माना जाने वाला अमरीका
पूर्णतः त्रस्त है
उसके परमाणु यंत्र आज बेकार पड़े हैं
एक अदृश्य दुश्मन ने
सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है

छुआछूत का नियमतः पालन हो रहा है
हम आगे जा रहे हैं या पीछे

एक विचार है मन में
कहाँ से कहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

किसान अपनी फसलें जला रहा है, बहा रहा है
मेरा देश कहाँ जा रहा है
केवल एक विचार आ रहा है
कहीं यह संकेत तो नहीं है एक युगांत का
एक युग का दुखद अंत
मुझे क्यों ऐसा लग रहा है
कि यह सब संकेत हो सकते हैं
एक नूतन सुबह के
एक सुखद कल के
एक सुदृढ़ भविष्य के

कहीं पढ़ा था
जो चीज आप को चैलेंज करती है
वही आपको चेंज करती है

श्रमिक अपने घर आ रहा है
एक नई शुरुआत करने
यही सुना था
घर से ही होती है
नई शुरुआत
और बड़ी कष्टदायक व हृदयविदारक
होती है यह प्रक्रिया

Thursday, April 2, 2020

कोरोना से करुणा की ओर

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने,
जीविकोपार्जन के लिये,
बाजार ने दिया काम,
काम ने दिखाए सपने,
और सपनों को साकार करने लिए,
भागने लगे हम ।

हम सब,
अपना सब कुछ भूलकर,
परिवार से दूर,
घर से बाजार की ओर,
गाँव से शहर की ओर,
सूक्ष्म से स्थूल की ओर,
मैदान से पत्थर की ओर,
अभाव से प्रभाव की ओर,
कम से अधिक की ओर,
एक से अतिरेक की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
ज्ञान से विज्ञान की ओर,
ज्ञात से अज्ञात की ओर,
स्पर्धा से प्रतिस्पर्धा की ओर,
अनुरोध से आदेश की ओर,
स्वीकृति से प्रतिरोध की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
कम से अधिक की ओर,
छोटे से बड़े की ओर,
रिश्तों से रुपयों की ओर,
योग से प्रयोग की ओर,
उपयोग से उपभोग की ओर,
जीवन से जीविका की ओर,
ठहराव से बहाव की ओर,
धरती से आसमान की ओर,
पूरव से पश्चिम की ओर,
प्रकृति से कृतिम की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

अविराम - विश्राम से परे,
करते रहे दोहन,
साधनों-संसाधनों का,
प्रकृति का,
अपने स्वार्थ हेतु,
अपने हित हेतु,
और, और से भी और की चाह में,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

आशाएं व अभिलाषाएं बढ़ती रहीं,
अपनी अपनी कहानियां गढ़ती रहीं,
रोकती रहीं, टोकती रहीं,
जब-जब साहस किया,
जाने का, बहाव से ठहराव की ओर ।

प्रतिभाओं व प्रतिस्पर्धाओं से ग्रसित मन,
उपभोग का आदी शरीर,
आसमान को छूने की तमन्ना,
आकाश से ऊंचे उड़ने का हौसला,
प्रयासों से कमाई पूंजी,
कंधों में समाहित ऊर्जा,
सब कुछ रोकते रहे,
विवश करते रहे प्रयासरत रहने को,
सपनों को साकार करने के लिए,
सपने जो समय के अनुसार बदलते रहे,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

संबंधों से दूर,
जमीन से ऊपर वाहन में, विमान में,
सब कुछ भूल कर,
बाजार के इशारे पर,
सूक्ष्म से बहुत दूर,
पत्थरों के शहर में,
जहां सब कुछ था, अधिक मात्रा में,
स्थूलता में परिलक्षित –
धन, भवन, व सुविधाएं,
यही दिखने वाला, सब कुछ,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

पार करते रहे नदियां,
बहकर और तैरकर, कूदते-फाँदते,
पार किए समंदर, एक नहीं, सात-सात,
मानवीय क्षमताएं हैं अपार,
और अपार है उनका संसार,
सात समंदर पार,
यह ज्ञात हुआ,
एक अज्ञात शहर में ।

विश्वास किए बिना
कि प्रकृति भी लेती है बदला,
अपने तरीके से,
कभी किसी को नहीं मिलता,
भाग्य से अधिक,
और समय से पहले ।

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु,
उस बाजार में जहां सब कुछ बिकता है,
बाजार में सब सामान है,
फिर चाहे
वह रिश्ते हों या हवा पानी,
समय हो या संभावनाएं,
मनुष्य हो या मनुष्यता,
यहाँ सब कुछ चलता है,
मांग-पूर्ति के नियमों के अनुसार,
सब कुछ निर्धारित करता है, बाजार,
मांग-पूर्ति व कीमत,
बाजार के अनुसार,
हर रिश्ते का होता है मूल्य,
हर सामान की होती है कीमत,
जो हम चुकाते हैं,
हम कीमत चुकाते रहे,
और भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

लगने लगा, जब हम चुका सकते हैं कीमत,
तो भागते रहते हैं,
हिरण और चीते, दोनों से तेज,
और यही सब मानकर,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
बनकर एक बिचौलिये,
प्रकृति व बाजार के बीच,
प्रकृति ने बनाया मानव,
और मानव ने बाजार,
और अपने अहम में, अपने दम्भ में,
यह साधारण सा समीकरण,
भूल बैठे हम,
अपना दौड़ना जारी रहा,
और उस दौड़ में,
उस अज्ञान के बहाव में,
इतना समय ही नहीं मिला,
कि अपने विवेक का कर पाते प्रयोग  ।

हम दौड़ते रहे, भागते रहे,
जीविकोपार्जन के आगे,
हांफते रहे पर भागते रहे ।

जब हमारी दौड़ ने,
सारी सीमाएं कर लीं पार,
और हम करने लगे प्रयास,
भागते-भागते पहुँचने का,
मंगलग्रह पर,
(कृतिम तकनीकों के द्वारा),
समय ने मिलकर प्रकृति के साथ,
बनाई एक योजना और खड़ी की,
कुछ ऐसी परिस्थिति,
समस्त मानव जाति के समक्ष,
कि हम समझ सकें अपनी औकात ।

आज हम सब भाग रहें हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
आज ली जा रही है, हमारी परीक्षा,
शायद प्रकृति ले जाना चाहती है,
हमें वापस अपने घरों की ओर,
स्थूल से सूक्ष्म की ओर,
पत्थर से जमीन की ओर,
मौद्रिक मूल्यों से मानवीय मूल्यों की ओर,
मशीन से मनुष्यता की ओर,
बाजार से घर की ओर,
शहर से गाँव की ओर,
प्रभाव से अभाव की ओर,
अधिक से कम की ओर,
विज्ञान से ज्ञान की ओर,
उपभोग से उपयोग की ओर,
प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर,
आदेश से अनुरोध की ओर,
प्रतिरोध से स्वीकृति की ओर,
रुपयों से रिश्तों की ओर ।

हम क्या साथ लाए थे,
जब आए थे, घर से बाजार,
हम कितना साथ ले जा रहे हैं,
जब जा रहे हैं, बाजार से घर,
एक अनुभवों की पोटली ।

चलो हम सब अब चलते हैं,
प्रयोग से योग की ओर,
जीविका से जीवन की ओर,
बहाव से ठहराव की ओर,
अज्ञान से ज्ञान की ओर,
आसमान से धरती की ओर,
पश्चिम से पूरव की ओर,
कृतिम से प्रकृति की ओर,
कोरोना से करुणा की ओर ।

प्रकृति शायद ले जाना चाहती है,
हमें वापस,
अपने घरों में,
अपने परिवारों व रिश्तों के बीच,
(जिन्हे हम बाजार आते समय घर छोड़ आए थे),
अपने स्वयं के बीच,
स्वनिरीक्षण हेतु ।

हमने क्या किया प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का,
हमने उसके द्वारा दी गई स्वतंत्रता का,
कितना बनाया मज़ाक,
और हम समझने लगे,
स्वयं को मालिक,
जुट गए संभावनाएं तलाशने की,
कि कैसे हम बना सकें,
मंगल गृह पर अपना घर ।

आज हम सब छिपे हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
अपने घरों में, अपने बिलों में,
सब कुछ होते हुए भी,
क्या है हमारे पास,
हैं तो मात्र कुछ रिश्ते,
आसपास
या फोन की कान्टैक्ट लिस्ट में,
जिन्हे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता ।

हम सबको ढूढ़ने होंगे रास्ते,
जीवन बचाने के,
इस परीक्षा की घड़ी में,
जीविकोपार्जन से कहीं अधिक,
हम दुखी हों या खुश,
हमें बदलने होंगे,
अपने जीने के तरीके,
बाजार के नियमों से परे,
बाजार के अस्तित्व से इतर,
जहां के लिए हम निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु ।

Thursday, December 13, 2012

जंगल में मनुष्य

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में

मदमस्त हाथी
भौंकते कुत्ते  
दहाड़ते शेर
गुर्राते भालू

गर्भवती बकरी
रंग बदलते गिरगिट
रंभाती गाय
हिनहिनाते घोड़े
मिमियाती बिल्लियाँ

टरटराते मेंढक
रेंगते कछुए
फुफकारते सांप

भिनभिनाती मधुमक्खियाँ
कावं-कावं करते कौए
गुटरगूं करते कबूतर
चिंचिहाती चिड़ियाँ

'जब आती है मौत
गीदड़ की
तो भागता है
शहर की ओर'

निहारते गीदड़
भीगी बिल्ली
खूनी शेर
एक सन्नाटा
शांति का शोर

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में
इस गाँव के मध्य
मेघों के घर में
या
इस शहरनुमा गावं में

जंगल में
क्यों घुस आयें हैं
कुछ मनुष्य
जानवरों के भेष में।


(18 Oct  2011 सुबह, जब मैं व मेरी पत्नी  टहल रहे थे, विश्वविद्यालय के एक  वरिष्ठ अध्यापक ने मुझसे हंसते हुए पूंछा 'आपने किसी मनुष्य को देखा टहलते हुए', उनका  इशारा उनके अन्य साथियों से था जिन्हें वो खोज रहे थे।  उनका यह वाक्य इस कविता का प्रेरणा-स्रोत बना। धन्यवाद प्रोफेसर शुक्ला)