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Tuesday, January 8, 2013

माचिस

हाथ में लेकर
माचिस
घूम रहे हैं
व्यस्त है
नुक्कड़ों पर
चौराहों पर
कैंटीन में
सभा में
हाथ में लेकर
माचिस

आजकल
रोजाना की
बरसात ने
कर दिया है
गीला
इन
माचिसों को

जब कभी
देखता हूँ
लोगों को
सेंकते धूप
एक साथ
समूह मे
मुझे लगता है
अब
माचिस का
गीलापन
कम हो रहा है
अपने
प्राकृतिक रूप में
आ रही है
माचिस

कौन नहीं जानता
माचिस का काम
होता है क्या

Thursday, September 27, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 8


44

मैं सूरज को बुलाता हूँ मुझे जब सांझ लगती है
मगर सब शुष्क मूल्यों सी धरा भी बाँझ लगती है
अजब मौसम गजब वर्षा अजब गर्मी गजब सर्दी
मैं इतना सोच सकता हूँ मुझे क्यों सांझ लगती है

45

मुझे जंगल सुहाता है सभी को खग बताता है
मगर फिर भी पहन कपडे आदमी कह्कहता है
जनम से जानवर होकर मनन से जानवर होकर
मैं इतना सोच सकता हूँ क्यों हर पशु सर झुकाता है

46

मैं सबसे प्रेम करता हूँ मुझे स्नेह भाता है
नहीं कोई मेरा दुश्मन सभी से अच्छा नाता है
सही हों पग सही हो पथ सही गन्तव्य सही जो जग
मैं इतना सोच सकता हूँ मुझे जीवन सुहाता है

18.7.12 Shillong
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i.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 7  (38-43 CLICK HERE)

ii.   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 6 (28-37 CLICK HERE)

iii.  मैं इतना सोच सकता हूँ  - 5 (25-27 CLICK HERE)

iv.  मैं इतना सोच सकता हूँ -      (24 CLICK HERE)

v.   मैं इतना सोच सकता हूँ -      (23 CLICK HERE)

vi.   मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)

vii.   मैं इतना सोच सकता हूँ -     (19 CLICK HERE)

viii.   मैं इतना सोच सकता हूँ -    (18 CLICK HERE)

ix.    मैं इतना सोच सकता हूँ -     (17 CLICK HERE)

x.     मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)

xi.    मैं इतना सोच सकता हूँ -  2 (7-11 CLICK HERE)

xii.   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 1  (1-6 CLICK HERE)

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)