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Monday, May 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 3

१२.
मेरे सब मित्र अच्छे हैं, मुझे मंजिल दिखाते हैं
मगर फिर क्यों वही मुझसे, सही रस्ता छिपाते हैं
मेरी मंजिल, तिरा निर्णय, तिरा संशय, मेरा रस्ता
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मंजिल वो पाते हैं.
१३.
मेरे सब बाल पकते हैं, वो बालों को रंगाते हैं
मगर क्यों उम्र को हम, सब प्रकारों से छिपाते हैं
तेरा रुकना, मेरा चलना, तेरा चलना, मेरा रुकना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं हम सोच पाते हैं.
१४.
मुझे आकाश के तारे, चमक कर क्यों बुलाते हैं
अगर उस व्योम मे इतने, मधुर स्वर गुनगुनाते हैं
तेरी आशा, मेरी मंशा, मेरे अपने, मेरी सीमा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि वे क्यों झिलमिलाते हैं.
१५.
मुझे रोना नहीं आता, उन्हे हंसना रुलाता है
मगर निष्प्राण जीवन का, यही चेहरा दिखाता है
तेरी भाषा, तेरे आंसू, तेरी क्रिया, तेरी बोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ साथ जाता है.
१६.
मुझे क्यों नींद आती है, उन्हें क्यों स्वप्न आते हैं
अगर हो कर्म सब अच्छे, निरर्थक अर्थ पाते हैं
मेरी निद्रा, तेरे सपने, मेरी आंखें, तेरी रचना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अपने बताते हैं.

7 oct 2011, shillong

Thursday, November 4, 2010

कांग्लुंग मे दिवाली

कांग्लुंग कॉलेज मे, आई दिवाली
प्रथम बार हमको लगा, रंग, रूप, जाली
रंग, रूप, जाली, याद आई थी घर की
ऐसा लगा, जैसे हो, यही मजबूरी हर की

हर सुख, हर स्थान पर, नहीं कभी संभव
स्वर्ग बने धरती, अगर हो जाये संभव
हो जाये संभव, प्रकाश घर-घर मे जागे
दिवाली सन्देश मे, यही कहे, भागे

भारतीय आकाश में, शोर रहे इस रात
शांति कर रही शोर है, कान्ग्लुंग की बात
कान्ग्लुंग की बात, रात मे होती वाह-वाह, दाद
खील, बताशे, खिलौने, हमे लगे अपवाद

सुबह हुई देखा सुना बीती दिवाली,
प्रथम वार हमको लगा रंग रूप जाली...

(27 Sept 1994 - Exam duty, room no 26, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan)

Wednesday, September 29, 2010

अच्छा लगता है हवा मे उड़ना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
भीड़ से दूर
वाहनो के शोर से दूर
बादलों से बात करना
टिमटिमाती धरती को निहारना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
अनजानों के साथ
तारों को निहारना
और ऊंचाइयों को छूना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
यह जानते हुए भी
कि यह क्षणिक है
मैं यहाँ रह नहीं सकता
            अनजानों के साथ
मैं एक क्षण भूल जाता हूँ
मुझे उतरना है
फिर जाना है
अनजानों से दूर
अपनों के पास
धरती पर

मुझे अच्छा लगना चाहिए
धरती पर रहना
हवा मे उड़ने से ज्यादा
फिर भी
यह क्षणिक अनुभूति अच्छी है
जानता हूँ
यह क्षणिक है

प्रायः क्षणिक अनुभूतियों हेतु
हम युद्ध करते हैं,
       क्रुद्ध होते हैं
जानते हुए भी
जीवन क्षणिक सुख
          क्षणिक अनुभूतियों के हेतु
नहीं बिताया जा सकता है.

प्यार, स्नेह, सम्बन्ध,
समन्वय, सम्भाव, सम्पन्नता
सब धरती पर ही है
फिर भी
अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
अपनों से दूर
क्यों?

(26 Sept 2010, On-board, GoAir - delhi-indore/8:10 pm)