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Wednesday, July 11, 2018

Leaving

Its ages since we saw you
Your unwanted tantrums
And wanted wishes
Have all taken you
To the city of dreams.

Far away in distance
Leaving us dreadful
Dreamful of your presence
And in the acoustics.

All of us have to move away
Far in the distance
To bridge the gap
between the dreams and reality.

But that would be so soon
And so sudden for so long.

All have moved
From the places of their origin
To the place of their dreams.

Recalling and reminiscing.

They say
Distances make no difference
When the hearts are loyal.

Leaving one home
And building another one
Is the part of life
For your tribe.

They say
The early we realise
The better it would be.

Leaving is part of life
But why have I
Not realised it yet
When it comes to you.

Thursday, June 6, 2013

जैसी चाह वैसी राह

हम वह सोचते हैं
जो सोचना चाहते हैं
हम वह पड़ते हैं
जो पड़ना चाहते हैं
हम वह खाते हैं
जो खाना चाहते हैं
हम वह पहनते हैं
जो पहनना चाहते हैं

क्या सोचना
क्या पड़ना
क्या खाना
क्या पहनना
और न जाने ऐसी
कितनी ही क्रियाएं
व कारक
निर्भर करते हैं
इस पर
आखिर चाहते क्या हैं
हम और आप

प्रयास आवश्यक है
जानने का यह
आखिर चाहते क्या हैं हम
जानिये - प्रयोग कीजिये 
स्वयं पर
अपने जानने के हक का
जानिये
आखिर चाहते क्या हैं आप
चाहिए अच्छा
होगा सब अच्छा

एक विडम्बना
आखिर क्यों
अक्सर
वह नहीं कर पाते हैं
जो करना चाहते हैं हम

Thursday, November 1, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ

48

वो मस्जिद तोड़ देते हैं ये मंदिर तोड़ देते हैं
ये नेता वोट की खातिर गणित सब  जोड़ लेते हैं
वही सब सुर वही सरगम वही है गीत  वही संगीत
मैं इतना सोच सकता हूँ नया सब कोढ देते हैं

49

वो कुप्पी को जलाता था जब भी रात होती थी
सुना है लालटेनों की भी अक्सर बात होती थी
वो अब रोशन करे है जिंदगी सबकी उजाले से
मैं इतना सोच सकता हूँ बस कलम दावात होती थी

50

मैं जब बीमार पड़ता हूँ मुझे कुछ क्रोध लगता है
नहीं लाये नहीं जाये इसी का शोध लगता है
जतन अच्छे करम अच्छे अरे समझो मेरे बच्चे
मैं इतना सोच सकता हूँ यही सब बोध लगता है

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Wednesday, September 29, 2010

अच्छा लगता है हवा मे उड़ना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
भीड़ से दूर
वाहनो के शोर से दूर
बादलों से बात करना
टिमटिमाती धरती को निहारना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
अनजानों के साथ
तारों को निहारना
और ऊंचाइयों को छूना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
यह जानते हुए भी
कि यह क्षणिक है
मैं यहाँ रह नहीं सकता
            अनजानों के साथ
मैं एक क्षण भूल जाता हूँ
मुझे उतरना है
फिर जाना है
अनजानों से दूर
अपनों के पास
धरती पर

मुझे अच्छा लगना चाहिए
धरती पर रहना
हवा मे उड़ने से ज्यादा
फिर भी
यह क्षणिक अनुभूति अच्छी है
जानता हूँ
यह क्षणिक है

प्रायः क्षणिक अनुभूतियों हेतु
हम युद्ध करते हैं,
       क्रुद्ध होते हैं
जानते हुए भी
जीवन क्षणिक सुख
          क्षणिक अनुभूतियों के हेतु
नहीं बिताया जा सकता है.

प्यार, स्नेह, सम्बन्ध,
समन्वय, सम्भाव, सम्पन्नता
सब धरती पर ही है
फिर भी
अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
अपनों से दूर
क्यों?

(26 Sept 2010, On-board, GoAir - delhi-indore/8:10 pm)

Saturday, May 22, 2010

समय का पहिया

समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे,
गति निर्भर करती है,
परिस्थितियों पर,
कई बार
गति प्रदान करने वाले
व्यक्ति पर भी,
परन्तु,
न्यूनतम व अधिकतम,
गति सीमा से परे,
कठिन है जाना.
जैसे लगता है,
रविवार २४ घंटे का नहीं होता,
बल्कि मध्य में या कभी-कभी,
प्रारम्भ में,
याचना करता है
दशमलव के प्रयोग की,
जबकि कई बार कई दिन
२४ घंटे के स्थान पर
४२ घंटे के प्रतीत होते हैं.
क्षण-घंटे-दिन-सप्ताह-माह व वर्ष,
किस प्रकार गुज़र जाते हैं,
ज्ञात होता है,
गुजरने के बाद.
यदि यह अनुभूति,
प्रारंभ में ही हो जाये,
जानिए,
आधी समस्याओं का समाधान.

आयु व समय
एक दूसरे से साक्षात्कार करते हैं
प्रायः
किस समय, कौन किसका
साक्षात्कार कर रहा है,
बता पाना कठिन है,
यदि कोई इसको समझ सके,
या स्पष्ट रूप से जान सके,
जानिये
आधी समस्याओं का समाधान...

स्वयं की आयु का ज्ञान कब होता है?
जब स्वयं द्वारा पानी दिए पेड़ की
टहनियां लहलाहतीं हैं,
फलों का लालच देकर
पास बुलाती हैं,
तब.

एक शिक्षक द्वारा पडाया गया छात्र
आसीन होता है उसके बराबर के
पद पर
तब.

मोहल्ले में पडोसी का बेटा
जो खेलता था कंचे
आँखों सामने,
अब व्यापार में पिता का
हाथ बटाता प्रतीत होता है
तब.

एक नौजवान दिखने वाले
अभिनेता का पुत्र
उसी अभिनेत्री के साथ
अभिनेता के रूप मे प्रदर्शित होता है
जिसके साथ कभी,
उसके पिता प्रदर्शित होते थे
तब.

इमारतों की मंजिलें
बढती दिखतीं हैं
तब.

सड़क की चौडाई
बढती दिखती है
तब.

रामलाल की बेटी गुडिया
जिसे कभी गोदी में खिलाता था
पुत्रवती होती है
तब.

या फिर तब
जब
माता पिता मे खिलखली
का सिलसिला
कम होता दिखाई देता है.

तब - जब
सुई में धागा डालने के लिए
माँ को चश्मे की

आवश्यकता होती है.

तब - जब
पिता को
चाय में चीनी
व सब्जी में नमक
अधिक लगता है.

तब - जब
डाक्टर अंकल से मेल अधिक
दिखता है
परिवार का.

तब - जब
स्वयं की गतिविधियाँ
दोहराई जाती हैं
स्वयं के बच्चों के द्वारा
स्वयं के शिष्यों के द्वारा.

सचमुच
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे
जो इस गति सीमा को
ठीक ठीक पड़ ले
जानिए
अधिकतर समस्याओं का समाधान...

(२६ सितम्बर, १९९४, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग, त्राशीगांग, भूटान, exam duty: room no 15 - 9:15 to 10 AM)