मेरी कविताएं
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Tuesday, April 21, 2015
दिशा 2
हवा के रुख को देखा
और धुंआ बढनें लगा आगे
दिशा का ज्ञान भूला
शान से चलने लगा आगे
हवा ले चल उडी
गंतव्य अपना दे दिया उसको
मैं हँसता सोचता हूँ
हवा-धुएं में बंध गए धागे
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