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Wednesday, May 19, 2010

संघर्ष

ख़ामोशी
मुझे अब घ्रणा हो गई है
इस शब्द से
जीवन पर्यंत
साथ निभाने के पश्चात्
नियंत्रण -
सीमा के साथ मना रहा है
रंगरेलियां
कब तक सहा जा सकता है
अन्याय
करना ही पड़ेगा संघर्ष

और
लांघना होगा सीमा को
और लाना होगा 
नियंत्रण से छीनकर,
ईश्वर - भाग्य - योग्यता,
कब तक बिताएंगे जीवन
इन असहाह शब्दों के सहारे
नहीं, कोई नहीं
प्राप्त कर पायेगा
कुछ भी
भाग्य से अधिक
नहीं, कभी नहीं
किसी को प्राप्त होगा
कुछ भी
समय से पहले,
शब्दकोष
साक्षात्कार कराता है
एक नए शब्द से
संतुष्टि,
सपने - कल्पनाएँ
यदि करनी हैं साकार
तो
भाग्य - समय - संतुष्टि
और ईश्वर
इन सबसे करना ही होगा
समझौता,
क्या यह सत्य नहीं है
कि लगा दी गयी आग
गगनचुम्भी इमारतों
को मनाने वाले
मजदूर की झोपड़ी में,
या फिर
क्या कुछ नहीं कहतीं
पुलिस चौकी में बिखरी पड़ीं,

टूटी चूड़ियाँ,
बताओ
क्या यह सत्य नहीं है
कि बेरोजगार सतीश ने
स्वयं को कर दिया
अग्नि के हवाले
या फिर
क्या यह भी सत्य नहीं है
कि
हरिया को पिलाकर शराब
करवाया गया वो काम
जो आता अपराध की संज्ञा में,
यदि स्वयं किया जाता,
अरे - मौन क्यों हो
मेरे प्रश्नों का उत्तर दो
मालूम है भली-भांति,
जब होगा एकांत,
तो किसी क्षण
एकदम शांत
तुम विचार करोगे.
यह सत्य नहीं है
कि अरबों रूपया खर्च किया गया
गरीबों कि झोपडी बनाने में,
तुम संभवतः
डूबते जाओगे
सागर कि गहराइयों में
और प्रयत्न करोगे
किसी सीपी को ढूँढने का
तुम सोचोगे
यह भी सत्य नहीं है
कि क़ानून उसकी रक्षा करता है
जो रक्षा करते हैं
क़ानून की.

अब करनी ही पड़ेगी
लड़ाई,
शांति से,
ख़ामोशी से,
क्योंकि
संघर्ष जीवन का पर्याय है

(11th February, 1992, 10:30 AM, Hermann Gmeiner School, Bhimtal, Nainital, UP, Uttranchal)