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Thursday, May 21, 2020

पापा और मैं

उनके रोने की आवाज
और आंसुओं का बहना
मैं सुन व देख रही हूँ
इस अंधकार में
दिनकर उन्हें प्रकाश देते हैं
अपने नाम को चरितार्थ करते हुए
और उनके आँसू
उसकी अभिव्यक्ति है

हम दोनों अलग नहीं हैं
पापा और मैं
हो सकता है अलग हों
हमारे एक दूसरे से
बात करने के तरीके
हमारे माध्यम
क्योंकि हमारी आसक्ति
उन माध्यमों में है
परंतु यह सब
नहीं करता है
अलग हम दोनों को
हमारी आसक्ति, हमारा अनुराग
किसी भी भाषा से परे है

मैं सोचती हूँ
उनकी आँखों के गीले होने के बारे में
उन अश्रुओं के बारे में
जिनका कारण
दिनकर द्वारा रचित
ओज से भरपूर पंक्तियाँ हैं
मुझे रुलाते हैं ईलियट
और वर्जीनिया वुल्फ़
जिस पर सतत् मुस्कराते हैं
रूमी

हम दोनों अलग नहीं हैं
पापा और मैं
हमारा अपना पागलपन है
और उसको हम साझा करते हैं
उस पुरानी किताब की तरह
जिसके प्रष्ठ होते हैं बहुत नाज़ुक
पीले-काले
भीनी-भीनी खुशबू बाले

हजारों-लाखों तरीकों से हम बातचीत करते हैं
शब्द-जाल से परे
शब्द, जो अपने
उपयोग, प्रयोग, व दुरुपयोग की
करते रहते हैं, प्रतीक्षा
एक कोने में बैठकर
सारे अन्तरों को पार करते हुए
भाषा के सभी समंदरों के पार
जैसे यह सारे कवि
रूमी, इलियट और रवि (दिनकर)
बना देते हैं
सूखे समंदर
हमारे गालों पर
और हम कर देते हैं
आत्मसमर्पण
उनके समक्ष
उन्हे प्रदान कर देते हैं अनुमति
हमको उस पीड़ा को देने की
जो आनंददायक है
सभी आँसू बुरे नहीं होते
कई बार वे होते हैं
हमारी प्रेरणा
और बन जाते हैं
अभिव्यक्ति
हमारी आनंददायक अनुभूति की ।


[उपरोक्त पंक्तियाँ, निम्नलिखित कविता का हिन्दी अनुवाद हैं। निम्नलिखित कविता एक बेटी का पिता की आँखों में आँसू (जो दिनकर की पंक्तियों को पढ़ने से उत्पन्न हुए) देखकर मिली प्रेरणा की परिणति]

======================

In remembrance of the poets I love. Papa being one of them.
dear Dinkar, thank you...

I hear him weep
Dinkar lives up to his name
in the dark air of the present
I hear him weep
my father

we're not too different, my
father and I
separated perhaps by
an attachment to
a mode of communication -
language - is
the least reliable.

I think of his weeping
of the tears that Dinkar gives birth to
of the way the words clench my father's heart -
clench and cling on to
I think of my weeping
of the tears that Eliot gave birth to
of the crying that Rumi smiles back at -
smiles and constantly sticks to

we're not too different
my father and I,
we have our madness - and
we share it like an ancient
copy of a book
with all its yellow
all its smell
and all its fragility

In a million ways we communicate
while words wait in a corner to be used
consumed, and misused. but look
at how we defeat all 'gaps'
all barriers of language
as these poets feed off
the salt etched on our skin
and we present to them
our bare naked selves
with red hearts in our hands
and like Woolf, we yell
"consume me"

Monday, February 22, 2016

लेखनी

क्यों,
आखिर क्यों,
तुम मुझसे बना रही हो दूरी,
उड़ती जा रही हो व्योम पार,
चली जा रही हो,
नदी के उस छोर पार,
(तुम भलीभांति जानती हो,
मुझे तैरना नहीं आता),

क्यों,
आखिर क्यों,
होती जा रही हो पत्थर,
शीत ने तुम्हारी स्याही भी जमा दी है,
(ग्रीष्म तुमको तरल भी नहीं कर पायेगी),
तुम चल भी नहीं रही हो,
फिर भी थकीथकी सी हो,

क्यों,
आखिर क्यों,
तुम हो गई हो,
मेरे स्पर्श से परे।

Sunday, July 5, 2015

चरैवैती-चरैवैती

मैं रूककर सोचता हूँ
सोचकर रुकता नहीं हूँ अब
चरैवैती चरैवैती को अक्सर
सोचता हूँ अब
कभी भी सोचकर रुकने से
पग परिणाम पूंछेंगे
मैं इतना सोचता हूँ
है नहीं कोई भी मंजिल अब
=============

Friday, November 15, 2013

मोबाइल की सीख

क्या सोचता होगा
बेचारा मोबाइल

सुनता है सबकी कहानी
उसको संप्रेषित करता है
चुन लिए गए लोगो को
मोबाइल पहचानता है
उसके मालिक के
विभिन्न रूपों को
मालिक की
हर क्षण परिवर्तित
भाषा व शैली
भाव व बोली

मोबाइल परेशान होता है
कभी-कभी हँसता है
जोर से
कभी-कभी क्रुद्ध होता है
सर पीटता है
मालिक को गाली देता है
मालिक की
निष्ठा के क्षणिक बदलाव पर
चुप रहता है
(बोलने की
प्रबल इच्छा होते हुए भी)

मोबाइल
लड़ाई का कारण बनता है
लड़ाइयों को कई बार
समाप्त भी करवाता है
कितनी ही बार झूठ सहता है
बहानों को संजोता है
दोस्त और दुश्मनों को
अपने में सुरक्षित करता है
अट्टहासों पर रोता है
बेबुनियाद अश्रुओं पर हँसता है

मोबाइल का
चेतन व अवचेतन एक है
किसी भी भेद से परे
नेटवर्क होते हुए भी
नेटवर्क न होने का बहाना
घर में होते हुए
बाहर होने का बहाना
मीटिंग में न होते हुए भी
मीटिंग में होने का बहाना
आदि इत्यादि
न जाने कितने
सच दिखने वाले झूठ 
सहता है

मोबाइल फिर भी
नहीं रखता है
अपने मालिक को
अपने स्पर्श से बंचित
उसकी परम श्रद्धा पूज्यनीय है
वन्दन योग्य है

मैंने कई मनुष्यों को देखा है
मोबाइल की भांति
करते व्यवहार
मोबाइल की भांति
करते स्वीकार
सत्य-असत्य सब
मोबाइल की भांति
करते ग्रहण सबकुछ
अपनी परम श्रद्धा
व विश्वास
अपने मालिक के प्रति
क्या हम कुछ
पूर्ण अथवा आंशिक रूप से
सीख सकते है
इस सीधे-साधे-सच्चे
मोबाइल से

Thursday, June 6, 2013

जैसी चाह वैसी राह

हम वह सोचते हैं
जो सोचना चाहते हैं
हम वह पड़ते हैं
जो पड़ना चाहते हैं
हम वह खाते हैं
जो खाना चाहते हैं
हम वह पहनते हैं
जो पहनना चाहते हैं

क्या सोचना
क्या पड़ना
क्या खाना
क्या पहनना
और न जाने ऐसी
कितनी ही क्रियाएं
व कारक
निर्भर करते हैं
इस पर
आखिर चाहते क्या हैं
हम और आप

प्रयास आवश्यक है
जानने का यह
आखिर चाहते क्या हैं हम
जानिये - प्रयोग कीजिये 
स्वयं पर
अपने जानने के हक का
जानिये
आखिर चाहते क्या हैं आप
चाहिए अच्छा
होगा सब अच्छा

एक विडम्बना
आखिर क्यों
अक्सर
वह नहीं कर पाते हैं
जो करना चाहते हैं हम

Wednesday, July 11, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 5

25

मैं कविता को बनाता हूँ, मुझे कविता बनाती है
मेरी अनुभूति को अभिव्यक्त कर, शोभा बढाती है
मेरी कविता, मेरी भाषा, मेरी दुनिया, मेरी आशा 
मैं इतना सोच सकता हूँ,  मुझे हरपल जगाती है।

26

मुझे साहित्य प्यारा है, ये जीवन का सहारा है 
मगर वाणिज्य रोटी है, इसी ने घर संभाला है 
मेरी क्षमता, तेरी ममता, मेरी भाषा, मेरी आशा, 
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही जीवन हमारा है. 

27

मैं बच्चों में जगाता हूँ, जो बूढ़़े छोड़ देते हैं,
बदलते मूल्य बच्चों को, भटकता मोड़ देते हैं 
अजब दुनिया, अजब धंधे, अजब आंखें, सभी अंधे 
मैं इतना सोच सकता हूँ, भटककर जोड़ लेते हैं। 

(10 May 2012, 11 PM, Shillong)

Saturday, February 4, 2012

मुझे जो बोलना सिखाती थी
आज चुप बैठ मुझको सुनती है
मेरी बेटी सुना रही है अब
मेरी माँ अब भी ख्वाब बुनती है

27 Jan 2012, Port Blair

Sunday, November 14, 2010

एक वार्तालाप

"आपकी  कवितायेँ  ठीक  से  खुल  नहीं  रही  हैं .
आपके  ब्लॉग  में  जा  के  भी  देखा."

"मेरे सिस्टम मे सब खुल रही हैं..."

"अब  मेरे  सिस्टम  में  भी  खुल  गयीं  हैं "

"समस्या सिस्टम की है...
कविता की नहीं
(बिचारी कविता बदनाम है)
सिस्टम ठीक होने पर
हर कविता खुलती है....
सिस्टम ख़राब होने पर
कविता लिखी जाती है
सिस्टम ठीक होने पर
कविता पड़ी जाती है..."

"क्या बात है!  शाबाश!! 
आप तो 'आशु'  कवि भी हैं. 
अभी-अभी पता चला.
बहुत खूब!!!"
***
समय, भावना, कल्पना, मजबूरी,
उड़ान, संघर्ष, साहस, व दूरी
हिम्मत, व्यवहार, सोच, व भाषा,
सपने, आँखें, दिशा और आशा
जिसको ना बना सके कवि,
सोचिये उसकी कैसी होगी छवि....

:::विजय कुमार श्रोत्रिय:::

Saturday, May 29, 2010

आशय

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

मेरे चुप से नहीं समझना
                मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                होठों को खोल नहीं सकता हूँ

इक महिला की खातिर तुमने
सारे नियम तार कर दिए

                इक सदस्य के कह देने से
                छै पर तुमने वार कर दिए

उडिया और गुडिया की सरगम
हम सब झेल नहीं सकते हैं
वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
बस्ते खोल नहीं सकते हैं

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

तेरे कन्धों की पीड़ा को
मेरा चश्मा देख रहा है
                तेरे सम्बोधन का आशय
                सबकी आंखें खोल रहा है

चश्मे से वो दिल तक पहुंचे
ऐसा बोल नहीं सकता हूँ
मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
होठों को खोल नहीं सकता हूँ

मेरे चुप से नहीं समझना
                 मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                 होठों को खोल नहीं सकता हूँ

Wednesday, May 19, 2010

किनसे लोग खफा रहते हैं

वो जो कुछ कुछ, चुप रहते हैं
या जो अधिक खरा कहते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

पानी बरसे, आंधी आये
नेहरु आये, गाँधी आये
निर्भर नहीं किसी पर हो जो
धारा मे अपनी बहते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

शोक हुआ बादल मंडराए
कौए, चील, गिद्ध भी गायें
हर ऋतु के आने जाने का
जो सार्थक अध्ययन करते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

सोना उठना, उठना सोना
अश्रु बिना जिनका हो रोना
आंसूं का खारापन पीकर
अपना जो जीना जीते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

क्या कहना और किसको कहना
क्यों कहना कैसे चुप रहना
शोर मचा हल्ला करते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

जीवन का चलना कपि बनकर
नहीं लिए सबके कर, कर पर
अपना जो जपना कहते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं.

देशभक्ति का पाठ पढाकर
द्वेष भक्ति स्वयं अपनाकर
जन गण मन पर चुप रहते हैं
उनसे लोग खफा रहते हैं...

(१८ सितम्बर,  १९९२, ११:२० बजे सुबह, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

मेरी दाड़ी

उँगलियों का स्पर्श,
मेरे गालों पर,
मेरे बालों पर
मेरी ... ऊबड़-खाबड़ दाड़ी पर,
कल्पना, स्वप्न, अभिलाषा
या उड़ान,
भींचना होठों का,
या फिर
उंगली के नाखूनों का संघर्ष
हाथ की - कभी स्वयं से, कभी दातों से,
गालों को टिकाना,
सम्पूर्ण हथेली पर,
या फिर
हथेलियों का,
उँगलियों को भींचकर
दोनों हाथों की
सर को सहारा देना,
किसी से बात करते
एक टकी लगा कर देखना
कहीं और
कुछ सूचक मात्र हैं
ये किर्याकलाप
कौन, कब, किससे, किसको, क्यों,
कैसे, कहाँ,
दर्शाते हैं
पथ उड़ान का
साकार करने के लिए
कल्पनाएँ
एक सम्पूर्ण सामंजस्य...
(२६ अगस्त १९९२, १० बजे सुबह, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

Monday, May 17, 2010

साहस

मुझको मालूम है
तुम्हारी आदत,
मैं जानता हूँ,
या
समझ सकता हूँ,
कब, कहाँ, क्यों, क्या होगा,
कौन करेगा,
परन्तु,
मौन हूँ,
क्यों,

पता नहीं.

मैं कुछ नहीं जानता,
उन्हें इन्तजार नहीं है,
सुबह का,
उन्हें प्यास है,
पानी की नहीं,
किसी और की.

वर्तमान में,
सच यह है,
कि
मैं कुछ नहीं जानता,
मुझे मालूम भी नहीं है
कुछ,
क्योंकि सत्य,
सत्य है,
एक कटु सत्य,
जिसे स्वीकारना
परे है,
स्वयं सत्य से,
सब जानते हैं,
सभी को मालूम भी है,
सत्य क्या है,
परन्तु,
साहस सब मे नहीं है,
है  - परन्तु कुछ में.


सत्य,
पीछे है,
काले शीशे कि उस दीवार के,
जिसमे,
इधर से उधर का,
देखा जा सकता है,
उधर रौशनी होने पर,
इधर रौशनी होने पर,
देखा जा सकता है,
उधर से इधर का.

निष्कर्ष,
सत्य को चाहिए,
अभिव्यक्ति,
और
अभिव्यक्ति को चाहिए,
रौशनी - प्रकाश,
और उस हेतु चाहिए,
साहस
जिसकी तलाश है...

(३१ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

Wednesday, May 5, 2010

नाक

नाक कभी उठती है, कभी झुकती है
नाक कभी रूकती है, कभी बहती है
नाक कभी लाल होती है, कभी पीली होती है
नाक कभी सूखती है, कभी गीली होती है.

नाक के नीचे मुहं होता है,
जो अधिकतर चुप, सोता है
नाक के ऊपर दो आंखे होती हैं
जो अक्सर बंद, सोतीं हैं

जिसका मुहं बंद रहता है,
और आँख सोती है
मित्रों ऐसों की नाक
शूर्पनखा की होती है....

Friday, April 9, 2010

WHEN I GREW BEARD

The harvest gets ready
for the season of spring
and the oath taken on the pillar
of a self-made temple
seems to be fulfilled.

Keen for cutting the harvest
and getting ready to take
another oath for the next target
or following self-ruled routine.

Day by day it gets thicker
and thicker, showing
some uneasiness to others,
giving chance to
their non-expressing minds
some expression of thought
‘sir looks desparate’,
I overheard
When I grew beard.

Forgot my own reasons
given to them by me,
by my ownself long back
sometime for my so-called desparateness.

Talking about my eating style
without disturbing my inner self
and outer side showing them
the marks of rich recipes.

Scratching every now and then
and cutting maintenance cost
by manual maintenance.

Do I really look old in you,
I tend to feel when they say so.
Why should they be taken so seriously.
‘Sir is doing another Ph D’
I heard
When I grew beard.

There are lies,
may be a safe place
to roam around
for flies.

Covering my lips
and obstructing many times
for their better optional use.

Hiding a pit covered
all over with grass around.
Releasing words without obstruction
and showing its genuine place.

I have to think a lot
before it gets thicker
and for being able to tell the reason
of its thickness,
of its being thick.

The weather gets cold
and I have got a reason to be told,
Yes for winters
I get geared,
When I grow beard.

Yes I am getting old,
at times I have reasons
to feel desperate
and yes there is an oath
in waiting for her,
I am not BenHur.

Just a person like anybody
with emotions.
I do need expression
and it becomes mode of expression,
of feeling alone,
feeling busy and
with commitment waiting for the dawn.

Still they at times tease
and remind me,
it is getting dense.

But how can I close my ears
to the whispering sound of theirs
‘he needs a close shave’
I overheard,
When I grew beard.


1st August 1999/00:40 night

EYES AND LOVE

The expression of Love
need no words,
having no language of its own.
But it turns them down
when it is shown.

The very feeling
brings the two together,
when the eyes speak
without uttering a single word,
without any physical advances,
even without chances.
When the eyes speak.

The cascade,
Oh!
That beautiful lake beside.
An island addressing the two,
side by side.

Penetrating my body
with the sound of love
and unknown breeze,
again the same sound of love,
no voice, no noise.

Speaking to my Love in eyes.
Eyes can speak no wrong,
though without words.
Eyes can express
nothing but Love.
Eyes can see no evil,
evil of action.

My dark brown eyes,
express something,
I wish it never dies.

(12th Sept 1997 at 11:45pm)
also available at: http://www.poetry.com/poems/eyes-and-love/7065251/