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Friday, December 28, 2012

शब्द

शब्द दान है शब्द मान है 
शब्द भागवत शब्द कुरान है 

शब्द सवेरा शब्द सांझ है
शब्द रोशनी शब्द चाँद है

शब्द जीत है शब्द हार है
शब्द आर है शब्द पार है

शब्द पीर है शब्द नीर है
शब्द शाश्वत शब्द नीड़ है

शब्द शक्ति है शब्द बाण है 
शब्द ब्रह्म है शब्द प्राण है 

Thursday, September 9, 2010

मेरी आंखें और चश्मा

आंखें क्या क्या देखती हैं?
चश्मे की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
किस समय कौन सा चश्मा?

चश्मा
कभी देखने के लिए
कभी ना देखने के लिए
कभी लोगों को दिखाने के लिए -
            मैं सब-कुछ देख सकता हूँ
            या
            मैं कुछ नहीं देख सकता

कभी यह भी दिखाने के लिए कि -
             मैं क्या हूँ
             मै क्या नहीं हूँ
चश्मा -
सब कुछ देख सकता है
चश्मा -
कई बार आँखों को विश्राम देता है
कई बार उसकी नग्नता को भी
इसलिए कि समय पडने पर,
नग्न होने पर
साफ़ और स्वच्छ रूप से देख सके

चश्मा -
देखने की गति बड़ा देता है
कई बार
चश्मा सब कुछ देख सकता है
यदि इस आशय से पहना जाये
चश्मा कुछ नहीं देख सकेगा
यदि इस आशय से पहना जाये
महत्वपूर्ण है
आशय
जो बदल भी सकता है
समय के साथ
परिस्थितियों के साथ
आप देखना चाहते हैं
या नहीं?

नग्न आंखें देखती हैं
वह भी - कई बार
जो देखना नहीं चाहते.
कई बार
नहीं देख पाती हैं
जो देखना चाहते हैं.
नग्न आंखें - नग्न हैं
आशय के महत्व से परे
          नग्न आंखें क्या क्या देखती हैं
          नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
          सब कुछ देखती हैं
आंखें
झुकी हुई या उठी हुई
खुली या बंद
हंसती या रोती
कटी या फटी
शांत या अशांत
अपना कहना कहतीं हैं
अक्सर
चुप रहती हैं, शांत रहती हैं
अपना कहना कहती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं
अपना कहना कह जाती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
सचमुच
काफी कुछ कह भी सकती हैं
वाणी के बिना.

आँखों की ध्वनि/आवाज
देखी जा सकती है - सुनी नहीं
अक्सर
देखना सुनने से अधिक
महत्वपूर्ण होता है.
विश्वास
देखने पर या सुनने पर - ?
नग्न आंखें बोलती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

अश्रु
आँखों का कहना कहते हैं
अपने समय पर बहते हैं
ख़ुशी मे हंसकर
दुःख मे फंसकर
बहुत कुछ सहते हैं
आँखों का कहना कहते हैं
एक माध्यम बनकर.

अश्रु का समय पर ना आना
किसी अभाव को प्रदर्शित करता है
उस व्यक्ति के मनोभाव को
चित्रित करता है
आंसुओं का समय पर ना आना
मौन रहकर
प्रयास करता है
कुछ कहने का
सब-कुछ सहने का
परन्तु
अश्रु का ना बहना
स्वयं एक माध्यम बन जाता है
कुछ कहने का
और कह जाता है
अक्सर
वाणी के बिना
प्रायः:
व्यक्ति करता है यही आशा
कैसे भी समझ सके
अश्रुओं की भाषा.

आंखें, चश्मा और अश्रु
चश्मा
आँखों पर
कई बार
अश्रुओं को आश्रय देता है
ना दिखा सके वह
जो दिखाना नहीं चाहती है
आंखें
ना कह सके वह
जो कहना नहीं चाहती हैं
आंखें -
आंखें
सब कुछ देखती हैं - देख सकती हैं
सब कुछ कहती हैं - कह सकती हैं
सब कुछ बोलती हैं - बोल सकती हैं
अश्रुओं की पीड़ा के परे
अक्सर
वाणी के बिना
शब्दों के बिना.

(28th Sept 1994, Room No 27, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan, 4:20 PM)

Wednesday, May 19, 2010

शब्द या अर्थ

शब्द, वही हैं
मात्र अर्थ बदल रहे हैं
या
अर्थ वही हैं
लेकिन शब्द बदल रहे हैं
लेकिन बदल अवश्य रहे हैं
शब्द या अर्थ...
(२६ अगस्त, १९९२, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)