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Thursday, May 24, 2018

प्रतिशोध

क्यों भला प्रतिशोध की ज्वाला लिए तुम जी रहे हो
क्यों दिखाकर द्वेष-भेष घूँट विष का पी रहे हो
नम्रता का भाव लेकर जय विजय नेतृत्व देखो
क्षम्य कृत्यों का लिए क्यों बोझ तुम अब जी रहे हो 

भूल जाओ भूत की भाषा विषय सब सांझ आई
उम्र कोई भी भले हो सुबह सबकी बार आई
घास झुककर चीड़ के सम्मुख खड़ी लहलहा रही है
और धरती पर पड़ी लकड़ी व्यथा पर मुस्कराई

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Thursday, November 12, 2015

बोझ

समाप्त कर लेता हूँ
स्वयं को
और 
ताउम्र
आत्मसमर्पण भाव में
जीवित रहता हूँ,
भूलता जाता हूँ
स्वयं को -
न स्वयं का
न किसी और का.

सहता हूँ पीड़ा
इसीलिए कहता हूँ
आत्मसमर्पण के बाद
मैं कर लेता हूँ 
आत्महत्या
और 
ताउम्र ढोता रहता हूँ
बोझ
एक लाश का.

[धन्यवाद सुनील जी ... आपके द्वारा फेसबुक पर लिखी पंक्तियों ने मुझे बाध्य किया इन पंक्तियों को लिखने के लिए]