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Friday, December 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 10

51

मैं अंधों को दिखाकर रास्ता संतुष्ट होता हूँ
मगर इन स्वस्थ आँखों की व्यथा पर रुष्ट होता हूँ
नहीं उपलब्ध साधन साध्य फिर भी व्योम छूना  है
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं संतुष्ट होता हूँ

52

मैं अक्सर रात को उठ बैठकर सपने सुलाता हूँ
भरी आँखों से सारी स्रष्टि की रचना भुलाता हूँ
मेरी हर थपथपाहट पर वो सपना मुस्कराता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मैं अपना कल सजाता हूँ

53

मैं अँधा हो चुका हूँ देखकर अंधी हुई दुनिया
मेरी आंखें भी ढूँढें हैं कोई क्रेता कोई बनिया
नयी सी रौशनी लेकर कोई बालक बुलाता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मेरे कंधे तेरी दुनिया


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Monday, May 17, 2010

परिवर्तन 2

परिवर्तन,
कहाँ है,
नहीं जानता,
परन्तु है अवश्य,
किसमे
यह भी नहीं मालूम,
परन्तु है अवश्य,
आखिर इसकी आवश्यकता क्या है.

संतुष्टि किसी को नहीं है,
शायद यही हमारी विवशता है,
फिर भी नैतिकता शब्दकोष मे है,
इसको ढूँढ पाना
कोई कठिन नहीं,
है परन्तु
कुछ के लिए,
जो परिवर्तन को परिवर्तित
करते रहते हैं.

सीमा - इसको मैं नहीं जानता,
संतोष - आँखों से बहुत दूर है,
विश्वास - इतिहास की पुस्तकों मे है,
धैर्य - कभी मित्र था,
म्रदुल - आता जाता था,
शोभा - पता नहीं आजकल कहाँ है,

समय, काल व परिस्थिति,
शब्दों की परिभाषाएं
परिवर्तित हो चुकी हैं,
ना जाने कितनी पीड़ियाँ
समर्पित हों चुकी हैं
बिना अर्चना के,
कभी-कभी मस्तिष्ट
प्रश्नों के प्रकाश में,
कुछ सोचने का प्रयत्न करता है
परन्तु प्रयत्न
मात्र प्रयत्न ही रहेगा
मैं जानता हूँ,
निरर्थक होंगे सारे प्रयास
फिर कहाँ होगा विकास...

(११ अक्टूबर, १९९१, ७:१५ बजे संध्या, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड)

पश्चाताप

मेरी चौखट पर
किसी नामर्द की आहट,
मस्तिष्ट विचारता है,
समस्त भूत की पुस्तकें;
कुछ जानी पहचानी सी प्रतीत होती है,
यह दस्तक;
शायद -
पुनः मेरे स्पर्श की कल्पना
उन्हे हो,
परन्तु, बल्कि...
अब मात्र
निष्प्राण, मानव समान
किसी भाषा के प्रयोग
को दर्शाते हैं;
अरे वो .......?
नहीं हों सकता,
मुझे विश्वास नहीं है,
और
हों भी क्यों;
आखिर..........!
खैर...

परिवर्तन,
वक़्त की,
समय की मांग है,
परन्तु -
पुनः स्वयं के प्रयोग को
बाध्य करता है,
शायद
वो भी बिवश है,
किसी को क्या मालूम
सत्य क्या है...
संभवतः
मै भी नहीं जानता,
शायद वह भी नहीं,
फिर भी
कुछ है अवश्य,
यदि नहीं
तो यह आहट
आखिर
जानी, पहचानी
क्यों लगती है,
यदि सत्य,
वास्तव मे सत्य है,
तो करना ही पड़ेगा
पश्चाताप,
मात्र आहट को नहीं,
स्वयं मुझे भी
संतोष
किसे और क्यों...

(२९ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश (उत्तराखंड))

Saturday, April 10, 2010

EMOTIONAL HEAVEN

Emotional Heaven of Physical satisfaction
Proportional gain of Manual experimentation
Tempting backs and smiling hints
Filling pots, leaving no footprints.

Deriving pleasure of life
In the absence of a wife
Laughing up and laughing down
Management makes you a better clown.

Full satisfaction, no production
Emotional Heaven needs to have must introduction.

(31st May, Exam duty 9 to 12 AM in MPH with U Pelgen & Paul, at 11:30 am, Shercol: Kanglung: Bhutan)


The words 'Emotional Heaven' were used by Lhato Jamba in the farewell speech for Mr Somnath on 30th May 2000 and further he added that Mr Somnath provided him Emotional Heaven which one usually gets from ladies. Some colleagues understood it as some indication of being gay.