Showing posts with label Imagination. Show all posts
Showing posts with label Imagination. Show all posts

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)

Friday, April 1, 2011

दर्द

उनकी आँखों ने कहा
मेरी आँखों ने सुना
मेरे होठों ने पिया
उनके होठों से गिरा

मेरे हांथों ने सुना
उनके क़दमों ने कहा
उनके गालों पे सजा
मेरे होठों का कहा

एक सन्नाटा सा था
सुबह चिड़िया ने कहा
आँख क्यों दर्द सहे
स्वप्न क्यों दर्द बना.

शिलांग ... १ अप्रैल २०११ ...
       

Wednesday, May 19, 2010

मेरी दाड़ी

उँगलियों का स्पर्श,
मेरे गालों पर,
मेरे बालों पर
मेरी ... ऊबड़-खाबड़ दाड़ी पर,
कल्पना, स्वप्न, अभिलाषा
या उड़ान,
भींचना होठों का,
या फिर
उंगली के नाखूनों का संघर्ष
हाथ की - कभी स्वयं से, कभी दातों से,
गालों को टिकाना,
सम्पूर्ण हथेली पर,
या फिर
हथेलियों का,
उँगलियों को भींचकर
दोनों हाथों की
सर को सहारा देना,
किसी से बात करते
एक टकी लगा कर देखना
कहीं और
कुछ सूचक मात्र हैं
ये किर्याकलाप
कौन, कब, किससे, किसको, क्यों,
कैसे, कहाँ,
दर्शाते हैं
पथ उड़ान का
साकार करने के लिए
कल्पनाएँ
एक सम्पूर्ण सामंजस्य...
(२६ अगस्त १९९२, १० बजे सुबह, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

Monday, April 26, 2010

जब कभी मैं अकेला होता हूँ

जब कभी मैं अकेला होता हूँ, 
मेरी लेखनी,
मुझे बिवश करती है,
अपने स्पर्श को,
लेकिन मैं उस घड़ी की
प्रतीक्षा करता हूँ,
जब मैं स्वयं,
उसके स्पर्श को
बिवश होऊं.
बिवषता के अंधकार में,
उजियारे मात्र को
चमकाने के लिए,
लेखनी थामकर बहुत कुछ
सोचता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

कभी गीत, कभी ग़ज़ल,
कभी कविता,
साहित्य,
हर क्षेत्र में विचरण
करने के पश्चात्,
निष्कर्ष निकालने में
स्वयं को असमर्थ पता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

कभी भूत तो कभी भविष्य,
बीते कल को याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

वास्तविकता की पुस्तकें,
अपनी रुआंसी हंसी को,
होठों के चुम्बन के लिए
बाध्य करती हैं,
अपनी बीती हुई गाथा,
दोहराती हैं,
याद करती हैं.
वे जो कमल के पुष्प के समान,
कीचड़ मे भी मुस्करातीं थीं,
अठखेलियाँ किया करती थीं,
शाम को सांझ डलते,
कभी कभी उस द्रश्य को
याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

बीते हुए क्षण
अकेले मे ही याद आते हैं,
अश्रुओं की वर्षा,
तो कभी,
ख़ामोशी के ओले,
अपनी-अपनी कथा,
स्वयं ही सुनाते है.
आशाएं और आकांक्षाएं,
गीले कागज़ पर
लिखे कुछ अक्षर,
जिस प्रकार
फ़ैल से जाते हैं,
इसी प्रकार,
बीते समय की छवि
गीली आँखों से
देखता हूँ,
सोचता हूँ,
तत्पश्चात निष्कर्ष,
रोता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

भविष्य,
अर्थात - आने वाला कल,
मात्र कल्पना के अंधकार मे
फंस जाता है,
जब कभी बीता हुआ कल
याद आता है.
कल्पनाओं को संचित करने के लिए,
स्वयं के मस्तिष्ट को,
स्वयं को,
असमर्थ पाता हूँ,

जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

मानवीय शरीर के छिद्रों के समान,
कल्पनाएँ,
अनगिनत हैं,
कुछ छिद्र सरलता से
दृष्टिगत होते हैं,
ठीक उसी प्रकार
कुछ कल्पनाएँ,
महत्ता/आवश्यकता दर्शाती हैं,
वाकी सब वकवास नज़र आती हैं,
फिर भी वकवास पर अधिक
ध्यानाकर्षित करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.

कलम की स्याही,
स्वतः ही,
कुछ हल्की सी होती जाती है,
आखिर वह भी
अपनी व्यथा दर्शाती है,
बिना आंसुओं का रोना रोती है,
विना निद्रा के
सो सी जाती है,
बिना दर्द के कराहती है,
अंततः
स्वयं को कुछ उभारने मे
असमर्थ पाती है,
उसके इस विचित्र रूप को
समझने का
प्रयत्न करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ...

(७ जुलाई १९८६ - तिलक कालोनी, सुभाष नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश)

Saturday, April 10, 2010

INVIGILATING

Standing, moving and sitting,
Chatting, checking and
Sometime sipping.
Knowing, not so well,
The speed of their pen
And the flow of the liquid
From their pen.
While I am standing
Moving and invigilating.

Their dry ink-pots
may intend to convey
The end of pen’s life.
It should not dry up
because
Continuation is Life.

But I cannot but witness,
their dry faces and wet hair,
their targeting eyes and
the movements of their eyeballs,
their drying pens and pots,
keeping of their pens,
in pen whole,
closing of their boxes,
turning pages to see
the effect of used ink,
and the eyes
without a blink.

I enjoy it
While I am standing,
Moving and invigilating.


(2nd Dec 1998 at 4:10 pm Exam duty in MPH with Ganguli)

TRANSITION

Sleeping,
Unlike before,
being the same body
And soul,
as before.
Sleeping,
when there is no sleep
in eyes.
Turning right,
turning left,
Marking the eye on the cleft.
Keeping the head,
in and out the quilt,
on and off the pillow,
far off
from the eyes' glow.

Conditioning the body,
for the nights ahead,
and the days,
far behind.
Preparing the bed,
for the weight ahead,
and the sound,
far behind.
Building a Room -
Room inside room,
for sharing happiness
And sorrows
within that room,
not beyond.
Without keeping the eyes,
Full of pond.

From sleepless nights,
to dreamless nights,
The Transition is
Full of Imagination
and Expectation,
Full of commitment
and sacrifice,
And of Devotion too.

2nd Dec 1998 at 3:35pm Exam duty in MPH with Ganguli