Saturday, October 1, 2011

उन्नीसवां दीक्षांत समारोह 2011

देखकर अच्छा लगा
चूना लगाते लोग
सड़क पर पेबंद लगाते
कर्मठ वेतनभोगी
जंगल साफ़ करते
कर्मचारी
ताल से खरपतवार निकालते
तदर्थ मजदूर
अधिकारियों व
कर्मचारियों द्वारा
प्रदर्शित की जाने वाली
व्यस्तता

अचानक
वाहनों की बढती गति
(कूड़ा उठाने वाले वाहन की भी)
विश्वविद्यालय मे
प्रकाश
स्वच्छता
गति
हर ओर
अतिथिदेवो भव
को चरितार्थ
करती गतिविधियाँ
अधिक उस ओर 
जहाँ से होकर
गुजरना है
अतिथि को
उन्नीसवां दीक्षांत समारोह है
विश्वविद्यालय रुपी
दुल्हन का
कल
वैसे इसकी उम्र
पार कर रही है
अडतीस को 

मैं सोचता हूँ
इस ओर अतिथि
प्रायः क्यों नहीं आते
क्यों नहीं होते
इस प्रकार के समारोह
प्रायः  
यहाँ की सड़कें, जंगल, भवन
साफ़ नहीं दिखते
चूना लगाने वालों के
होते हुए भी
प्रायः
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(3 pm, NEHU Shillong, 29th Sept 2011 - Tomorrow is NEHU's 19th Convocation.  The vice president of India, Shri M Hamid Ansari is going to deliver convocation address)

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)

Thursday, September 8, 2011

My Intention

I have closed
Windows,
As I fear
Fresh Air.

I have closed
Doors,
As I fear
Honest Visitors.

I have closed
Garden Gate,
As I fear
Blooming Buds
and
Soothing Odour.

You read my intentions,
I Hope and
You Can.

(5:50 pm, L-57, NEHU, Shillong: 4th Sept 2011)

Sunday, September 4, 2011

Struggle

With
Folded hands
Cottoned ears
Tied lips
Blind eyes
They
Struggle.

Power
Praises
Peoples'
Protest.

Rotten Principles
Faded Values
with
Sweet Spices
Are getting cooked
Ready to serve
When requisitioned.

(5 pm, 4th Sept 2011, Shillong, L-57, nehu)

Friday, July 1, 2011

कागज़

मैंने पड़ा था:
कागज़ के फूल
कागज की नाव

मैंने देखे:
कागज के कोण
कागज के रिश्ते
कागज़ के पैसे
कागज़ के बिल
देखा:
कागज का सूखा
कागज़ की बाड़
कागज़ का पानी
कागज़ के पुल

देखी - कागज़ की सजा
देखा - कागज़ का पुरुस्कार
देखे - कागज़ के सपने 
कागज के वार
कागज़ की उड़ान
कागज़ की शान
कागज़ का द्वेष 
कागज़ का प्यार 

आजकल प्रयास कर रहा हूँ
सुनने व समझने की 
कागज़ की भाषा 

शिलांग ::: १ जुलाई २०११ ::: ११ बजे रात्रि ::: 

Saturday, June 25, 2011

शेरुब्त्से में होली

शेरुब्त्से कॉलेज में, होली का त्यौहार
होती भारत मे दिखी, रंगों की बौछार
रंगों की बौछार, कोई है पीला कोई लाल
मुहं में गुजिया दबी है, हाथों मे गुलाल

पहली होली पर दिखा, गुजिया का आभाव
कॉलेज में टीचिंग करो, या फिर गुजिया खाव
या फिर गुजिया खाव, नहीं भारत है प्यारो
जिसको देखो भरो, और पिचकारी मारो

होली पर दुश्मन लगे, मित्रों से भी मित्र
मित्रों के चेहरे लगे, हमें बडे बिचित्र
हमें बडे बिचित्र, गले से हाथ मिलाएं
होली पर तो तनिक, मित्र यों ना शर्मायें

भिन्न रंग तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न प्रदेश
भिन्न भेष तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न हर देश
भिन्न चर्म तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है मर्म
भिन्न वस्त्र तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है धर्म
भिन्न-भिन्न है धर्म, मगर है एक धर्म ही शेष
सब धर्मों मे एक है, मानव धर्मं विशेष

भारतियों की संस्कृति, रंगों की झोली
जितना उसमें डालिए, उतनी कम बोली
जाने पर आता हमे, कब आये होली
हमको लगता दोस्तों, होनी थी हो ली...

(27 Sept 1994 - Room No 26, Exam Duty, 11 AM, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan)

पंद्रह अगस्त

पंद्रह अगस्त

परतंत्रता के जाल में
असहाय पक्षी के समान
पंखों को थे हम फड़फड़ा
इक बंद पुर्जे के समान

सोचते थे हम यह कब
टूटेगा जाल पक्षियों का
ओर कब होगा समापन
विदेश के इन भक्षियों का

सोंचते थे वह समय भी
अब बहुत करीब है
अब तो हम कहते हैं यह
कि देश यह गरीब है

और भी आकांक्षाएं
थीं हमारे मस्तिष्क में
छोड़ के इस जाल को
हम उड़ चलें अन्तरिक्ष में

वह भी दिन आया जवानों
जब देश था यह बड़ा मस्त
याद होगा आपको भी
दिन था वो पंद्रह अगस्त.

विजय कुमार श्रोत्रिय,
(Subhash Nagar, Bareilly, 1984)