Thursday, July 18, 2013

आदमी और मौत 2

आदमी और मौत 1 से आगे … 

मौत सबकी है आपकी भी है 
क्यों भला लड़ के लोग जीते हैं
जिंदगी प्यार की कहानी है
इसको बुनते हैं आओ सीते हैं

मैंने सपने भी कुछ सजाये हैं
उनको बाटूँगा आप हंस देंगे 
आपकी उस हंसी के कारण से
स्वप्न बिखरेंगे प्राण भर देंगे


आप हँसते रहेंगे जीवन भर
मौत आएगी लौट जाएगी
आप उसको गले लगायेंगे
हाँथ झटकेगी मुस्कराएगी

आप रोकर उसे पुकारेंगे
उसको अब कुछ हंसी तो आएगी
उसकी स्मृति उबाल पर होगी 
अट्टहासों से तुम्हे सताएगी 

उसके हंसने में आप रोओगे
और तड़पोगे छटपटाओगे
तुम्हे अनुनय-विनय थकाएगी
भूत की पुस्तकें मंगाओगे

पृष्ट दर पृष्ट उड़ रहे होंगे
सभी स्म्रतिचिंह पाओगे
शीत वायु उष्ण ज्वर देगी 
दर्पणों को सभी मंगाओगे 

ह्रदय के शूक्ष्मतम तिकोने में
कर्म और काण्ड याद आयेंगे
आत्मबल साथ छोड़ता होगा
'अहम्' विदाई  गीत गायेंगे

मौत दर्पण को  हाथ में लेकर
तुमको तुम से मिला रही होगी
और दुनिया तुम्हारी आंखें देख
अपने आंसू बहा रही होगी

आप से तुम पर आ गया हूँ मैं
तुम से तू हो तो कुछ नहीं कहना
एक बालक पुकारता माँ को
तुम से तू पर रही सही है ना

इसलिए कहता हूँ औरों पे छोड़ दो हँसना
वरना रोओगे तुम मौत भी ना आएगी
करवटें छीन रात बिस्तर पर
तुमको हर पल बहुत सताएगी  


मेरे सन्दर्भ सोच कर देखो
तुमको सब कुछ समझ में आएगा
एक दर्पण रखो हमेशा साथ
तुमको अंतःकरण सिखाएगा   

दोष औरों पे लगा ना पाओगे
रोष करना भी सुधर जायेगा 
मौत फिर हंसके तुमसे बोलेगी
प्राण मिथ्या अधर पे आयेगा 

तुम्हारी राह देख रो लेगी 
पास आएगी सार बोलेगी 
साधना सत्य की सजगता से 
साथ जाएगी पाट खोलेगी 

अपने जीवन को इस तरह ढालो 
प्रेम से देखो प्रेम से बोलो
प्रेम सिखलाओ अपने मित्रों को
प्रेम की चाबी से ताले खोलो 

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Thursday, July 11, 2013

आदमी और मौत 1

आदमी मौत से जब प्यार करने लगता है
मौत हंस देती है संवाद छोड़ देती है
अनुभवों के विशाल संचय से 
खोज कर लेती है बस याद जोड़ देती है 

दोष औरों में देख सकते हो 
कितने शीशों को तोड़ सकते हो  
आदमी 'मै' में जी नहीं सकता 
कितने औरों को जोड़ सकते हो 

रोष क्यों उनपे आप करते हैं 
उनको जीना है यार जीने दो
आप कांटो की सेज पर सोओ
उनको फूलों के हार लेने दो 
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Wednesday, June 26, 2013

ज्ञान

78

अजी क्यों लोग अपने ज्ञान को सर पर चड़ाते हैं
यही अज्ञान होता है स्वयं न जान पाते हैं
किसी से लेके शीशा देखते हैं सर नहीं झुकता
बस इतना सोच सकता हूँ वही अपमान पाते हैं

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77 - अनुरक्ति 
76 - अलंकार
75 - कारक 
74 - मोती 
73 - क्यों 
72 - रिश्ते 2 
71 - मुस्कराना 
70 - सवेरा 
68, 69 - होली 2013
67 - रिश्ते 
66 - आस 
65 - गन्तव्य
64 - मैं इतना सोच सकता हूँ 15 
63 - मैं इतना सोच सकता हूँ 14 
61, 62 - मैं इतना सोच सकता हूँ 13 
60 - मैं इतना सोच सकता हूँ 12    
57 से 59 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 11
54 से 56 तक  - माँ तुझे सलाम
51 से 53 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 10
48 से 50 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 9 
47 - राजनीति 
44 से 46 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 8 
38 से 43 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 7 
28 से 37 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 6 
25 से 27 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 5 
24 - नींद 
23 - विविधता 
20 से 22 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 4 
19 - विवाह 
18 - संतुष्टि 
17 - आवाज 
12 से 16 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 3 
7 से 11 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 2
1 से 6 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ  1 

Wednesday, June 19, 2013

प्रणाम

प्रोफेसर माधवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय द्वारा 12 जून 2013 को फेसबुक पर निम्न पंक्तियाँ लिखी गयीं .... 

प्रणाम,
कभी प्रणाम किया है
अनन्त आकाश को,
चमकते सूर्य को, 
छलकते झरने को, 
मृदु, कोमल हवा के झोंकों को
कभी सचमुच, झुक कर प्रणाम किया है ?

हाथ जोड़ कब खड़े हो गए हो तुम
किसी जंगल, वन, घाटी या 
मुस्कुराते वृक्ष के सामने ?
क्षुद्रता क्या त्यागी है कभी इतनी
कि कृतज्ञता-भाव से
आपाद नमन किया हो
उस हवा को जिसने तुम्हें सांसे दीं ?

इन पंक्तियों के उत्तर में मैंने लिखा ...

और 
क्या कभी 
महसूस किया है 
दर्द 
उन ओस की बूंदों का 
जिन्हे पता नहीं है 
तुम्हारा नाम
तुम अकस्मात ही 
व्यस्त नहीं हो गए 
अपनी पीड़ा बांटने 
इस आशा से परे
कि इन आँख से 
गिरे मोतियों 
और 
ओस की बूंदों मे 
कोई सामंजस्य हो 

प्रणाम 
हे सूर्य
तुझे प्रणाम
प्रणाम 
हे आकाश
हे चट्टान
हे वायु
हे मेघ 
प्रणाम 
हे पुष्प 
हे किरण 
हे बूंद
हे अश्रु
प्रणाम 
हे प्रकृति 
प्रणाम....

Wednesday, June 12, 2013

अनुरक्ति

77

यह मौसम ले गया 
घर से उड़ाकर हास्य के स्वर
कि जैसे बैठ मैं 
शमशान मे देखूँ मचलते पर 
अजब सी बात है 
पत्थर मुझे पानी पिलाते है 
बस इतना सोचता हूँ 
क्यों रही अनुरक्ति जीवन भर
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76 - अलंकार
75 - कारक 
74 - मोती 
73 - क्यों 
72 - रिश्ते 2 
71 - मुस्कराना 
70 - सवेरा 
68, 69 - होली 2013
67 - रिश्ते 
66 - आस 
65 - गन्तव्य
64 - मैं इतना सोच सकता हूँ 15 
63 - मैं इतना सोच सकता हूँ 14 
61, 62 - मैं इतना सोच सकता हूँ 13 
60 - मैं इतना सोच सकता हूँ 12    
57 से 59 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 11
54 से 56 तक  - माँ तुझे सलाम
51 से 53 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 10
48 से 50 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 9 
47 - राजनीति 
44 से 46 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 8 
38 से 43 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 7 
28 से 37 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 6 
25 से 27 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 5 
24 - नींद 
23 - विविधता 
20 से 22 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 4 
19 - विवाह 
18 - संतुष्टि 
17 - आवाज 
12 से 16 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 3 
7 से 11 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 2
1 से 6 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ  1 

Thursday, June 6, 2013

जैसी चाह वैसी राह

हम वह सोचते हैं
जो सोचना चाहते हैं
हम वह पड़ते हैं
जो पड़ना चाहते हैं
हम वह खाते हैं
जो खाना चाहते हैं
हम वह पहनते हैं
जो पहनना चाहते हैं

क्या सोचना
क्या पड़ना
क्या खाना
क्या पहनना
और न जाने ऐसी
कितनी ही क्रियाएं
व कारक
निर्भर करते हैं
इस पर
आखिर चाहते क्या हैं
हम और आप

प्रयास आवश्यक है
जानने का यह
आखिर चाहते क्या हैं हम
जानिये - प्रयोग कीजिये 
स्वयं पर
अपने जानने के हक का
जानिये
आखिर चाहते क्या हैं आप
चाहिए अच्छा
होगा सब अच्छा

एक विडम्बना
आखिर क्यों
अक्सर
वह नहीं कर पाते हैं
जो करना चाहते हैं हम

Thursday, May 30, 2013

स्वाद

खाना चाहते हैं मीठा
खाते हैं मीठा
खाना चाहते हैं नमकीन
खाते हैं नमकीन
खाना चाहते हैं खट्टा
खाते हैं खट्टा

हम चुनते हैं स्वाद
जिव्याह अनुसार
अनुभव अनुसार
स्वादानुसार

स्वाद से परे होती है
दवाई
उसका चुनाव होता है
रोगानुसार
व रोगीनुसार

आखिर चाहते क्या हैं आप
स्वाद लेना
या
रोग को मिटाना

चुनाव का अधिकार
कैसे हो सकता है
किसी और का
चुनिए स्वयं
स्वादानुसार
रोगानुसार
इच्छानुसार

23.11.12: 10:50 AM, Shillong