Tuesday, April 21, 2015

दिशा 2

हवा के रुख को देखा
और धुंआ बढनें लगा आगे
दिशा का ज्ञान भूला
शान से चलने लगा आगे
हवा ले चल उडी
गंतव्य अपना दे दिया उसको
मैं हँसता सोचता हूँ  
हवा-धुएं में बंध गए धागे 
==================

Monday, April 13, 2015

दिशा

मैं घर के द्वार पर बैठा
हवा से बात करता हूँ
लगाकर नाक पत्ती फूल
खुशबू साथ पढता हूँ
ये हिलते पेड़ उडते पक्षी
बहता जल खुला अम्बर
मैं इतना सोचता हूँ
क्यों दिशा की बात करता हूँ 
=======================

Tuesday, March 31, 2015

महक

यह चिड़ियों की चहक़
नूतन दिवस संगीत देती है
ये फूलों की महक
निर्मल नई सी प्रीत देती है
न जाने क्यों ये पक्षी
फूल मानव भोज होते हैं
बस इतना सोचता हूँ
ये महक ही जीत देती है
=====================

Saturday, March 7, 2015

दस्तूर

यह क्या दस्तूर दुनिया का
धनी धनवान होते हैं
गरीबी आँख आंसूं पी रहे
शमशान होते हैं
अजब सा द्वन्द रेखाओं में
बंटकर वार करता है
मैं इतना सोचता हूँ
क्यों अगर भगवान् होते हैं
==================

Thursday, January 15, 2015

प्लेटफार्म

ऊँची उड़ानों के स्वप्नों के साथ
सब चढ़ जाते हैं
विमानों में
रेलगाड़ियों में
या बसों पर
प्लेटफार्म
सारे प्लेटफार्म
मूक बने
हर रोज़
हर पल
निहारते रहते हैं
दौड़ भाग में लगी
इन मानव मशीनों को
सारा पाथेय प्रबंधन
ये मूक प्लेटफार्म करते हैं
परन्तु ऊंची उड़ानों पर जा रहे राही
प्रायः उनको अपनी स्मृति में
संजोते ही नहीं
और
स्थिर प्लेटफार्म निहारता रहता है
भीड़ को...

Monday, November 3, 2014

हार-जीत

मैं लड़कर जीतता हूँ
जीतकर लड़ता नहीं हूँ अब
खड़ा हो सोचता हूँ
भीगकर पढता नहीं हूँ अब
अजब सी जीत है
सांसत में अक्सर छोड़ देती है
मैं इतना सोचता हूँ
हार मे ही जीतते हैं सब
==================

Sunday, October 12, 2014

सोच


वो जैसा है नहीं मुझको
दिखाई देता है वैसा
मेरा चश्मा मुझे आगाह
करता है कपट कैसा
सफल जीवन नहीं यदि
कष्ट पीड़ा साथ जीवन में
मैं इतना सोचता हूँ
क्यों दिखाई देता बस पैसा

================