Saturday, December 17, 2011

पत्थर और मैं

आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

सड़क के बीच
देखकर बहता पानी

अप्राकृतिक
वर्षा देखकर
पानी के टेंकों से

देखते
सीमा लांघते

सुनते
साक्षात झूठ

देखते
मूल्यों का होते
सौदा

मूर्त व मौन
रूप से
देखते-पड़ते
वो सब कुछ
जिसपर प्रतिक्रिया
आवश्यक है

अपेक्षित
प्रतिक्रिया
पर लगाते
हुए विराम

उपस्थिति
अनुपस्थिति
के अंतर के ज्ञान
से परे

मैं पत्थर
बनना नहीं चाहता
या फिर
सोचता हूँ
बनूँ ऐसा पत्थर
जिसके पास अपने आपको
फेंकने की हो
शक्ति

मुझे ज्ञात है
पत्थर से ही बनते हैं
भवन

पत्थर के
इधर-उधर
होने से होता है
विभाजन

पत्थर में होते हैं
प्राण
और प्रायः
लोग मानते हैं
पत्थर में होते हैं
भगवान

लेकिन फिर भी
स्वभावतः
मैं पत्थर बनना
नहीं चाहता

फिर
आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

मुझे डर है
न बन जाये
ये मेरी
आदत

निवेदन
रोको
मुझे
पत्थर बनने से.

(11:10 pm, 10 Dec 2011, Shillong)

Wednesday, December 7, 2011

सांस और मैं

1.
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.

(1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57)


2.
मुझको सांसें गिना रही थी वो
जो घडी देख कर गुजरती थी
मेरा सारा गणित अधूरा था
जिन्दगी सांस ही से चलती थी.

3.
सांस चलती है तो सताती है
सांस रूकती है तो सताती है
सांस आवागमन का माध्यम है
जिंदगी को बहुत बताती है.

(2nd Dec 2012, 8 PM, Shillong)

4.
सांस को छोड़ कर चलूँगा मैं
जहाँ तक दोस्त लेके जायेंगे
मेरा विश्वास मेरे अपने हैं
सभी सम्बन्ध हम निभाएंगे

5.
सांस का टूटना अपेक्षित है
मगर हर सांस को जिऊंगा मैं
मुझे झुकने में दर्द क्यों होगा 
अगर संभव जहर पिऊंगा मैं

6.
कष्ट साँसों से अब नहीं होता
सांस का साथ मैं निभाऊंगा
जब कभी सांस साथ छोड़ेगी 
मैं उसके साथ मुस्कराऊंगा 

7.
सांस की उम्र ढल रही है अब
मेरे चलने पे मुस्कराती है
मैं चल रहा हूँ यार रुकरुक कर
मेरे कदमो पे सर झुकाती है 

8.
सांस लगता है प्यार करती है
मैं लिख रहा हूं सांस चलती है
मैं भरी भीड़ मे अकेला हूँ
मगर ये साथ साथ चलती है

9.
चलो अब सांस को यहीं छोडें 
उसको अविराम काम करने दें
मेरे सपनों को नींद आती है
स्वप्न साँसों को बात करने दें 

10.
साँस लडती है साथ मत छोड़ो
तुम लिखो मैं तुम्हारी संज्ञा हूँ
तुम जियो मैं तुम्हे संवारूंगी
मैं विशेषण सधी प्रतिज्ञा हूँ

11.
तुम्हारा सूक्ष्मतम रहे जीवित 
तुम्हारी कल्पना को पर दूँगी
तुम्हारे शब्द कर्ण कोमल हों
तुम्हे हर पल नवीन ज्वर दूँगी

12.
तुम मुझे छोड़ कभी सकते नहीं
मैं तुम्हे लड़ के जीत लुंगी विजय
न मेरी जीत है न तेरी हार
मैं तेरे साथ ही रहूंगी विजय

(11 pm New delhi Railway Stn, platform 9, 
waiting for AC Express to Lucknow, 3 dec 2011)

13.
सांस मुझको सुला रही है अब
मेरे माथे को थपथपाती है
मुझे अब अंधकार भाता है
मेरी माँ मुझको याद आती है

14.
चाहता हूँ कि सांस को ओडून
मगर तकिये को वो सजाती है
मेरी चादर से पैर लम्बे हैं
पैर फैलें न वो जताती है

15.
उसका दर्शन बड़ा निराला है
मेरे अस्तित्व को बताता है
मेरे दर्शन को प्रश्न करता है
सभी उत्तर स्वयं सजाता है  

(12 midnight, in Train, 3 dec 2011)

16.
आँख है बंद सांस चलती है
उसके करतब सभी सताते हैं
सोच लूँ फिर भी भूल सकता नहीं
उसके सपने मुझे जगाते हैं

17.
उसका स्पर्ष याद आता है
उसका रंग-रूप भी लुभाता है 
वो मेरे साथ है जागि हुई
बंद आँखों को चमचमाता है

18.
मेरा परिचय हुआ है अब जाकर 
उसका वंदन ह्रदय से करता हूँ
मेरा जीवन उसे समर्पित है
उसके जीवन से प्यार करता हूँ 

19.
मेरे सम्पर्क-सूत्र साझे है
उसके होने से ही मै होता हूँ
मेरे होने से ही वो होती है
अपनी माला को मैं पिरोता हूँ

20.
मेरी कविता उसी के वर्णन से
कम से कम कुछ तो उसको पाया जान
उसका कृतज्ञ हूँ रहूँगा सदा
मेरा हर रोम उसका अंतर्ज्ञान

21.
अंत करता हूँ मांगता हूँ क्षमा
बहुत कुछ कह दिया अधिकारों से'
फिर मिलूँगा किसी बहाने से
विजय होगी इन्ही विचारों से.


(5:30 pm, Lucknow Delhi Shatabdi, 
4 dec 2011)

Friday, December 2, 2011

सांस


2.
मुझको सांसें गिना रही थी वो
जो घडी देख कर गुजरती थी
मेरा सारा गणित अधूरा था
जिन्दगी सांस ही से चलती थी.

3.
सांस चलती है तो सताती है
सांस रूकती है तो सताती है
सांस आवागमन का माध्यम है
जिंदगी को बहुत बताती है.

2nd Dec 2012, 8 PM, Shillong

Thursday, December 1, 2011

सांस

1.
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.

1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57...


Thursday, November 24, 2011

चांटा

महंगाई का
भ्रष्टाचार का
भेदभाव का
अवसरवादिता का
झूठ का
वादों का

गलत इरादों का
चांटा
अब तक मारा है
सत्ताधारियों ने
आम आदमी पर

अब
जब आम आदमी
गया है बिदक
और
जीवित है
उसकी संवेदना,
आज
उसका संतोष
संयम,
धैर्य,
सहनशीलता,
तितिक्षा,
वात्सल्य,
सब
उसको कर रहे हैं
बाध्य
उस हाथ को
उठाने पर
जिसकी एक उंगली
ने सत्ताधारियों
को चुना हो.

क्यों
इस चांटे
की अधिक
चर्चा है
उस चांटे से

मेरी कल्पना से
परे है
इसकी सोच...


[24 Nov 2011, Shillong, 10:10 PM]
Today one person (Harvinder Singh, a sikh youth) slapped Sharad Pawar, Minister of Agriculture, Govt of India.  I am little skeptical about what must have prompted him to think of taking such a step.  There have been few cases of this nature before, when people have been throwing chappals/shoes on the powerful people.  It is the outburst of common man against the ruler/powerful.  Where are we heading???



Tuesday, November 22, 2011

घर

जिनके घर हैं
घर में नहीं रहते
जिनके नहीं हैं घर
तलाशते रहते हैं
अपना घर.

(22 Nov 2011...1040 AM, Shillong)

Monday, October 24, 2011

रैपर

आज सुबह
विश्वविद्यालय के
प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य
भिन्न भिन्न दूरियों पर
देखे पड़े हुए
रैपर
चिप्स-नमकीन के पैकेटों के
देखीं पड़ी हुई
शराब की खाली बोतलें
देखे पड़े हुए
प्लास्टिक के खाली
लुदके हुए गिलास
कागज की प्लेटें
(प्रयोग की हुई)
देखे पड़े हुए
रैपर
सिगरेट के पैकिटों के
माचिस की डिब्बियों के

यहाँ
अवश्य देखा होगा
चिंगारियों ने
स्वयं को
आग मे बदलते
और आग को
राख में

यहाँ
अवश्य हुए लगते हैं
जीत के जश्न
या
मातम
चलते चलते
या
रूककर सड़क के किनारे
बैठकर
इन मुंडेरों ने
अवश्य सहारा दिया होगा
लडखडाते कदमो को
प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य

क्या यहीं
की थी
पोरस पर
चढाई
सिकंदर ने

हार के बाद
जब पोरस से पूछा था
सिकंदर ने
'क्या सुलूक किया जाये
आपके साथ'
'वही जो एक राजा को
करना चाहिए
राजा के साथ'

क्या यहीं से 
सिकंदर की सेनाएं
वापस कर दी गयी होंगी.

प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य
सभी निर्णय लिए गए होंगे

ये सब
पड़े हुए रैपर
अपनी व्यथा कहते हैं
कविता-कहानी
को जन्म देते हैं
ज्यादा कुछ नहीं
जानता हूँ मैं
परन्तु
इतना अवश्य
ज्ञात है मुझे
यहाँ बहुतों की
हुई है
मौत.
(और बहुतों के रैपर
यहाँ अभी भी पडे हुए हैं).

(11.10.11, 6:20 AM, Shillong, NEHU Campus - after the morning walk)

(विश्वविद्यालय मे पिछले लगभग दो वर्षों से कुछ मुद्दों को लेकर गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी, विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्यालय प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य है, जहाँ सभी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, कर्मचारियों व अध्यापकों ने इसी सड़क पर कई बार अनशन व रैली निकाली.  अब वो सब गतिरोध लगभग समाप्त सा दीखता है, परन्तु मुझे उन दिनों का स्मरण प्रायः होता है सो इस कविता का जन्म उसी अनुभूति की अभिव्यक्ति है)