Saturday, December 6, 2025

रिश्ते 37

रिश्तों का गणित
अनूठा होता है
जहाँ
बताना और जताना
गिनाना और दिखाना
बातचीत का केंद्र होते हैं
तराजू लिए लोग
नापने-तोलने में व्यस्त रहते हैं
और दूर बैठे रिश्ते
उन पर मुस्कराते हैं
उन पर तरस खाते हैं
और अपना पता बदल लेते हैं
रिश्ते केवल जीवित दिखाई देते हैं
उनमें जीवन होता नहीं है
रिश्ते अपनी गति अनुसार
नियमानुसार
चलते रहते हैं
निर्जीव

बहुत कठिन होता है 
यह जानना
कौन किसका कितना है
मैं किसका कितना हूँ
क्या वो भी मेरा उतना है

उतना-कितना 
मेरा-उसका
रिश्तों में दूरी लाते हैं

बिना किसी जीवन के
ऐसे रिश्ते चलते तो हैं
पर उनमें रुधिर सूखता जाता है
और हम रुक जाते हैं
रिश्ते चलते रहते हैं

कई बार हम भूल जाते हैं
कि यदि हमको कोई
छोटा दिखाई दे रहा है तो
या तो हम उसे बहुत
दूर से देख रहे होते हैं
या फिर
गुरूर से देख रहे होते हैं
थोड़ा पास जाइए
बैठिए, संभलिये, बात करिए
विस्तार समझिए
गणित से परे 
क्षेत्रफल को जानिए 
फिर निर्णय लीजिए
गुरूर को थूकिये फिर कहिए
कोई छोटा है या बड़ा

तलाश
रिश्तों में जीवन ढूँढने की  

Sunday, September 7, 2025

रिश्ते 36

रिश्तों का गणित
अनूठा होता है
हिसाब-किताब
जोड़ना-घटाना
गुणा-भाग
मोल-भाव
लेना-देना
यह सब
रिश्तों को कमजोर करता है
फिर भी
प्रायः जोड़ना-घटाना ही
रिश्तों का मापदण्ड होता
प्रतीत होता है

रिश्ते परे होते हैं
किसी भी गणित से
जोड़ना-घटाना
जहाँ एक ओर
रिश्तों की नींव
कमजोर करता है
वही रिश्तों को
पत्थर बना देता है
रिश्तों की परिधि
रिश्तों के घनत्व को
प्रभावित करती है
रिश्तों की ज्यामिति
प्रकार और पैमाने से इतर होती है
रिश्तों का मूल और ब्याज
रिश्तों के मूल्य, निवेश और प्रत्याय
से बहुत भिन्न होता है
मूल्य, क़ीमत और मोल-भाव
रिश्तों के मूल को
बहुत प्रभावित करता है
मूल की कोई क़ीमत
कभी हो ही नहीं सकती

मोलभाव में उलझे रिश्ते
अभाव व प्रभाव के माध्यम से
रिश्तों को प्रभावित करते हैं
और नकारात्मक विचारों को
जन्म देते हैं

अभाव का अनुभव
और अनुभव का अभाव
सारी गणित
इन्ही के मध्य
चलती रहती है

दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है
व्यक्तित्व के बनाने में
रिश्तों को बनाने में, सजाने-संवारने में
अभाव का अनुभव
सशक्त बनाता है
जड़ों को मज़बूत रखता है
दृष्टिकोण को
परिपक्व बनाता है
तो अनुभव का अभाव
परिपक्वता से दूर रखता है
अक्सर
अपरिपक्वता भी मददगार होती है
रिश्तों को सुधारने में
रिश्तों को बचाने में
अनुभव का अभाव
कई बार व्यक्ति को धरातल पर रखता है
उड़ने से रोकता है

अपने सरल-सहज-नैसर्गिक स्वरूप में
बिना किसी कृतिमता के
रिश्ते चलते रहते हैं

Sunday, June 1, 2025

रिश्ते 35

रिश्तों का भूगोल निराला होता है
दूरियाँ या नज़दीकियाँ
उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं
जितना रिश्तों को बनाये रखने का
आशय व रिश्तों में विश्यास,
हम दूर रहकर भी
रिश्ते निभाते हैं
और पास रहते हुए भी
रिश्तों को बिगाड़ लेते हैं.

रिश्तों में पारस्परिक प्रेम व स्नेह
बरकरार रहता है,
मीलों दूर रहते हुए भी.

मिलना या न मिल पाना
रिश्तों में दूरी नहीं पैदा करता
यदि रिश्तों में सम्मान भाव हो,
एक दूसरे के प्रति
सहजता व स्नेह का भाव हो.

रिश्ते दूर रहकर भी
बखूबी निभाये जा सकते हैं
यदि रिश्तों में नज़दीकियाँ हों.
ज़बरदस्ती की नज़दीकी से
सुकून की दूरी अच्छी है.
ठीक उसी प्रकार
जैसे नज़दीक रहते हुए भी
बातचीत न होना
और दूर रहते हुए भी
कुशलक्षेम जानने की
उत्सुकता होना
और
मिलने का उत्साह
जीवित रहना

हमनें पढ़ा था
रहिमन धागा प्रेम का,
मत तोड़ो चटकाय;
टूटे से फिर ना जुड़े,
जुड़े गाँठ पड़ जाय।

एक तरफ धागे हैं
जो उलझ कर
और भी करीब आ जाते हैं
एक तरफ रिश्ते हैं
जो जरा सा उलझते ही
टूट जाते हैं

धागे और मोती का भी रिश्ता
अमिट होता है

उनका साथ
और एक दूसरे के प्रति
कृतज्ञता का भाव
उनकी नज़दीकियाँ
नजरंदाज नहीं की जा सकतीं हैं.

सच में
रिश्तों का भूगोल निराला होता है

रिश्ते 34

रिश्तों का सच जानना
बहुत कठिन हो जाता है,
जब रिश्तों में सरलता का
अभाव होता है।

रिश्तों का जीवट रहना,
उनके जीवित रहने से
कहीं अधिक
महत्वपूर्ण होता है।

कई बार हम
इस प्रश्न का सामना करते हैं
कि क्या रिश्ते सत्य हैं।

मुझे लगता है
सत्य को परिभाषित करना
और उसको रिश्तों में ढूँढना
बहुत ही मुश्किल है।

सत्य सत्य होता है
और रिश्ते रिश्ते होते हैं,
रिश्तों के सच को
जानने से कहीं अधिक
रिश्तों को जानना होता है,
उनके अपने स्वरूप को जानना,
बिना किसी दिमाग़ी मशक़्क़त किए,
बिना किसी गुणा-गणित के,
सहज भाव से।

रिश्ते स्वयं बोलने लगते हैं,
संवाद करने लगते हैं,
अपने जीवट होने का
प्रमाण देने लगते हैं,
रिश्ते चलते रहते हैं। 

रिश्ते 33

रिश्तों का साया
सुकून देता है,
अपनी ऊर्जा को
सकारात्मक तरीक़े से
प्रयोग करने को प्रेरित करता है,
चिंताओं से मुक्त रखता है
और विश्वास को बढ़ाता है।

रिश्तों का साया
जहां एक ओर व्यक्ति को
स्वतंत्र बनाता है
वहीं दूसरी ओर
स्वावलम्भन को भी
सुदृढ़ करता है।

ऐसा प्रायः कहा जाता है
कि किसी के साये में
क्यों जीना
परंतु यह बात
रिश्तों के साये पर
लागू नहीं होती।

साये का आकार-प्रकार
घटता-बढ़ता रहता है
फिर भी उसके आग़ोश में
शांति का आवास होता है,
साये के चलायमान होने में ही
जीवन होता है
अन्यथा स्थिर साये
उसके आग़ोश में रह रहे लोगों
को अस्थिर कर देते हैं।

विचित्र है सायों का
गणित, भूगोल और भौतिक विज्ञान,
जो रिश्तों को तदनुसार
परिभाषित करता है,
रिश्ते चलते रहते हैं
सायों में
और उनके अभाव में भी।

रिश्ते 32

रिश्तों की रेल
चलती है
प्यार व विश्वास की
पटरी पर

कभी सवारी-गाड़ी की तरह
कभी माल-गाड़ी की तरह
तो कभी तीव्र गति से चलने वाली
मेल एक्सप्रेस
राजधानी एक्सप्रेस
शताब्दी या वन्देभारत की तरह

गाड़ी का प्रकार
निर्भर करता है
क्षेत्र, काल व परिस्थिति पर
कभी रिश्ते की रेल को
तीव्र चलना होता है
तो कभी
सवारी गाड़ी की तरह
धीरे-धीरे
इस गाड़ी से चलकर
गन्तव्य पर पहुँचने में
समय तो अधिक लगता है
परंतु इस सफ़र का
आनंद अलग होता है
सभी से मिलकर
सभी की सुनकर
और सभी के साथ-साथ चलकर

रिश्ते की रेल का
वास्तविक सुख
सवारी गाड़ी में चलने में ही मिलता है
तीव्रता में गन्तव्य तक तो
हम समय से पहले पहुँच जाते है
परंतु कई बार साथ चलने वालों के
ठीक से दर्शन भी नहीं होते
हमें केवल
पहुँचने की जल्दी होती है

और माल-गाड़ी
रिश्तों के भार को ढ़ोती हुई
दिखाई देती है
यों तो माल गाड़ी भी
उसी पटरी पर चलती है
जिन पर अन्य गाड़ियाँ चलती हैं
परंतु
प्यार व विश्वास की पटरी पर माल
बहुत हिलते-ढुलते
अपने निर्धारित गन्तव्य पर पहुँचता है
पाथेय के रूप में

किसी विशेष समय में
तीव्रता अवश्यंभावी होती है
परन्तु हमेशा तीव्रता का भाव
रिश्तों में निकटता लाने में
सहायक नहीं होता

रेल चाहे कोई भी हो
पटरी एक ही होती है

रिश्तों की रेल
प्यार व विश्वास की पटरी पर चलती है

रिश्ते 31

रिश्तों से
कभी-कभी उठ जाता हैविश्वास
और अनायास ही
रिश्ते विलुप्त होते जाते हैं.

इतिहास का हिस्सा
बनने से भी कई बार
ऐसे रिश्ते वंचित रहते हैं.

रिश्ते पराजित होते हैं
नियति के अनुसार.
नियति का मोहरा बन
सब कुछ झेलते हैं
रिश्ते.

कालचक्र में फँसे रिश्ते,
परत दर परत
सब कुछ संजो कर रखते हैं
और कई बार
अपनी व्यथा बिना सुनाए ही
ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं.

कई बार अपने अतीत में
मुग्ध होकर मुस्कराते भी हैं
और दुःखी भी होते हैं.
कोई उनकी व्यथा
सुनने वाला भी नहीं मिलता है
कई बार.

चलते तो ऐसे रिश्ते भी हैं
अपनी गति से.

Wednesday, April 24, 2024

रिश्ते 30

गाँठ या यों कहें ग्रंथि
रिश्तों के जीवन में
बाधा भी बनती हैं
और स्वावलोकन का कारण भी,
बेहतर इंसान बनने की ओर
प्रेरित भी करती हैं,
और अहंकार में लिप्त रहने की
ओर खींचती भी हैं।
गाँठे हमेशा अपने रूप को
बदलती हैं,
अनुभव व समय के साथ,
सकारात्मक सोच
व रिश्तों की प्रगाढ़तावश।
परंतु यदि
अपने दम्भ में ग्रसित मानसिकता
व्यक्ति पर हावी होती जाती है
तो यही ग्रंथि
और कठोर हो जाती है,
और शरीर के राख होने तक
उसकी कठोरता जस की तस रहती है।
गाँठ को सरल करने
व उसके स्वरूप को कठोरता से
कोमलता के रास्ते होते हुए
सहज भाव से खोलने की प्रक्रिया में
किसी न किसी को झुकना होता है,
रिश्तों को नैसर्गिक
एवं सुचारु रूप से
जीवित रखने की ख़ातिर।

रिश्ते 29

रिश्तों की ऊन 
बहुत गरमाहट देती है.

रिश्तों की ऊन से
हाथ द्वारा बने स्वेटर,
किसी भी सर्दी में
गरमी का एहसास देते हैं,

स्वेटर बनाने वाले
और
पहनने वाले के रिश्ते
ऊन से बंधे रहते है
एक सिरे से दूसरे सिरे तक.

किसी भी रंग, क़िस्म
और क़ीमत पर,
रिश्तों का रंग
हावी होता है.

ऐसे स्वेटर पीढ़ी दर पीढ़ी
पहने जाते है.

रिश्तों की ऊन
बांधे रहती है
पीढ़ियों को.

कई बार
उधेड़े भी जाते हैं
ऐसे स्वेटर
और नये रूप में,
नये फैशन के,
नये आकार और प्रकार
में बदल दिये जाते हैं.

रिश्तों की ऊन
बहुत गरमाहट देती है.

आजकल
ऐसे रिश्ते, ऐसे स्वेटर
कम ही दीखते हैं.

Tuesday, November 14, 2023

रिश्ते - 28

रिश्ते पानी की तरह
साफ़ होते हैं
तो नदी बन समंदर हो जाते हैं.

रिश्ते बर्फ़ की तरह
जम भी जाते हैं
और हिम सागर भाँति
पिघलते भी हैं.

रिश्ते मजबूत होना
अच्छा होता है
परंतु चिन्ता का विषय होता है
रिश्तों का पत्थर हो जाना.

रिश्तों में लोच ज़रूरी होता है
और लोच के सीमेंट से बने रिश्ते
मजबूत होकर भी पत्थर नहीं होते.

रिश्तों को मिट्टी होने से
बचाना भी होता है
और बिखरने से
सम्हालना भी होता है.

रोड़ी और रोड़े मिलकर
रिश्ते में मज़बूती लाते हैं.

रिश्ते हाथ से रेत की तरह
सरक भी जाते हैं
और ईंट की तरह खड़े भी रहते हैं.

ईंट का जवाब पत्थर से देने से
रिश्ते टूट जाते हैं.

ईंट से बने मकानों को
रिश्ते ही घर बनाते हैं.

ऐसा घर जहां
सुख-दुःख साथ-साथ रहते हैं
और
जीवन को आनंदमय बनाते हैं.

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और इनको भी पढ़ें - 









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Wednesday, October 12, 2022

सरल

सरल होना कठिन है याद रखना, तरल होना कठिन है याद रखना ;

कठिन होकर चलोगे गिर पड़ोगे, उसका उठना कठिन है याद रखना |


भले पत्थर चलें तुम तरल रहना, भले रस्ता कठिन हो सरल रहना ;

सरल होकर गिरोगे चल पड़ोगे, कष्ट सहना मगर ना गरल बनना |

Monday, July 18, 2022

Memory

Memorising self 
Keeps the pictures
Safe in our cognition
Unsafe in our lockers
Yet Frames the prints
And the 
Experiencing self
Multiplies the effect
Through a vivid presence
Tears roll when
Experiencing self weds
With the memorising self
The brush fails to color
And the color begins to fade
It all keeps adding to the torso.

The owl in us
Still forces us to carry canon
And foolishly we keep clicking
Clicking till the battery lasts
Clicking till the memory finishes
That modern day Memory
With the bytes market decides
We keep clicking
And we keep forgetting
What we click

Clicking is mechanical
Feelings are humane

We need better machines
Or better humans
Human memory
Or the one in Bytes

Images matter
And so does memory

(9 am: Marriott to Airport in Banglore: 17.07.2022)

Thursday, March 31, 2022

बाज़ार 2

आजकल शाम सुबह कल से काम होता है 
कल से बाज़ार घर आता है दाम होता है
बहुत आराम है दिखता है हम बिक जाते हैं
एक दुकान सा जीवन तमाम होता है

Wednesday, February 9, 2022

बाज़ार

हम सभी, कुछ बेचकर जीते हैं, मर जाते हैं
बोझ ढ़ोते हैं, थकते हैं और सो जाते हैं
कलम चलती है, रक़म आती है, चली जाती है
इसी बाज़ार में रहते हैं, नहीं घर जाते हैं

Saturday, April 24, 2021

रिश्ते

दरवाज़ों से
प्रवेश करते हैं रिश्ते
चौखटें लांघते हैं
खिड़कियों से झांकते हैं
रोशनदानों को निहारते हैं
चहारदीवारी पर छलांग लगाते हैं
छतों पर घूमते हैं
दुछत्तियों में छिपते हैं
कमरों में भटकते हैं

रिश्ते परदे हटाते हैं और डालते भी हैं
करवटें बदलते हैं
दरारों से झांकते हैं
कई बार कोनों में दुबकते भी हैं
आँगन में छाँव तलाशते हैं
परछाई से साथ चलते हैं
 
दीवारों पर टांग दिए जाते हैं
बड़े क़रीने से
फूलमालाओं के साथ
रिश्ते चलते रहते हैं
यादों के साथ
रुकते तो हम हैं.

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Sunday, April 18, 2021

समय

आदमी उपयोग से उपभोग पथ पर जा रहा था 

और जीवन चंद्रमा पर खोज मन पर छा रहा था

गिरा मुँह के बल चपल बल भूल आँखें मींच बैठा 

अब उसे अनुभव दिशा भ्रम ज्ञान कुछ-कुछ आ रहा था 

Wednesday, February 10, 2021

मनुष्य और बाज़ार

घातक है बाज़ार का वर्चस्व
बाज़ार हमारी ज़रूरत पूरी करे
ना कि हम बाज़ार की 

हम होते जा रहे हैं
बाज़ार की ज़रूरत
बाज़ार के सहारे छोड़ दिया है
सब कुछ, रिश्ते भी
हम सब सामान हो गए हैं
बिक रहे हैं, बिना हमारे जाने 
हमें लगता है
हम बाज़ार जाते हैं
सामान व सुविधाएँ ख़रीदने
वास्तविकता में तो हम बिक रहे होते हैं
बाज़ार में

बाज़ार घुस आया है
हमारे घरों के भीतर
और हम ख़ुशी-ख़ुशी उसका
कर रहे हैं स्वागत
हमें काफ़ी कुछ मुफ़्त में दिया जा रहा है
और हम उत्साह में, उन्माद में
उसे सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं
बिना यह जाने
कि जब कभी, कुछ भी, होता है, मुफ़्त 
तो हम सामान हो जाते हैं
उन सभी कम्पनियों के लिए
जो कर रही होती हैं 
हमारी भूख का व्यापार 
और मुफ़्त का उन्माद 
बंद कर देता है
हमारी आँखें
हमारा दिमाग़
और यह सब 
दिशा देने लगता है
हमारी मनोवृत्ति को 
और मुफ़्त से बनी मनोवृत्ति
नियंत्रित करती है
हमारी मानसिकता
हम और गरीब होते जाते हैं
अपनी सोच में

बाज़ार हमें एक ना एक नशे का
कर रहा होता है आदी
और हम बिक रहे होते हैं
सामान की तरह
सुविधाओं के रूप में
हर घड़ी, 
हर लेन-देन, 
हर सौदे के साथ

बहुत घातक है
बाज़ार का प्रवेश
हमारी निजी ज़िंदगी में
घातक है बाज़ार का वर्चस्व
समाज पर
मानवता पर

कम्पनियों के बंद होने से
नहीं बंद होता है बाज़ार
क्योंकि उनकी भूख बंद नहीं होती
वह भूख, जिसका कोई अंत नहीं है
बदल जाता है
उन कम्पनियों का नाम और निशान (लोगो)
कभी कभी मालिक भी

सब कुछ सुचारु रूप से चलने के लिए
मात्र ज़रूरतों को पूरा करने के लिए
होना चाहिए बाज़ार
और व्यक्ति को करना चाहिए
ज़रूरतों का निर्धारण, स्वयं
ना कि बाज़ार को
(जैसा आज हो रहा है)

बहुत घातक है 
बाज़ार का वर्चस्व
जहां बाज़ार हमारी ज़रूरतों का निर्धारण करे
यही परिस्थिति
हमें बना देती है सामान
बाज़ार में बिकने वाला सामान
और आदमी 
बाज़ार हो जाता है

बहुत ख़तरनाक है
आदमी का
मनुष्य का
बाज़ार हो जाना

उतना घातक नहीं है
चाइना का बाज़ार में होना
जितना उसका बाज़ार के माध्यम से
हमारे जीवन में घुसना
जो हमको सस्ता बना रहा है
मूल्यों में भी
और मानसिकता में भी

लाइक्स, सब्सक्रिप्शन और कॉमेंट
पर निर्भर बाज़ार
कर रहा है कमज़ोर
सामाजिक ढाँचे को
प्रशंसा का व्यापार हो रहा है यहाँ
कितनी बाज़ारू हो गई है
पसंद-नापसंद
यही है
मनुष्य का बाज़ार हो जाना

टीआरपी से मापा जा रहा है
विज्ञापनों का मूल्य
और विज्ञापनों के बल ही
चल रहे हैं चैनल
जो हमारी सोच पर हो रहे हैं हावी
सब कुछ परोसा जा रहा है
भूख बड़ाई जा रही है
ज़बरदस्ती, सुचारु रूप से  
और उसे बताया जा रहा है
माँग में संशोधन की प्रक्रिया
उधारी से बढ़ाया जा रहा है
पूर्ति को,
औद्योगिक व व्यावसायिक गतिविधियाँ
ऋण केंद्रित होती जा रही हैं
और गगनचुंबी कार्यालयों में
गुणा-गणित चल रही है

समाचारों का बाज़ार है
जहां बाज़ार का समाचार
पीछे छूट गया दिखता है
न्यूज़ चैनल धीरे-धीरे
व्यूज़ चैनल बनते जा रहे हैं
निष्ठा बिक रही है
सत्ता और सत्तू दोनों
बाज़ार में हैं
विज्ञापन, समाचार और बाज़ार
सब टीआरपी नियंत्रित कर रही है
और टीआरपी बिक रही है
ख़रीदी जा रही है

बाज़ार में
भाव का निर्धारण
भावनाएँ कर रही हैं
और मानवीय भावनाओं से
खेला जा रहा है
खुलेआम
भावनाओं का हो रहा है
व्यापार
और मदारी बना बाज़ार
मनुष्य को 
बंदर की तरह 
अपनी ढपली की धुन पर
नचा रहा है

कहाँ है स्वतंत्र बाज़ार
कौन स्वतंत्र है
इस बाज़ार में
विकल्पों की उपलब्धता की आड़ में
फ़्रीट्रेड का बनाया जा रहा है मज़ाक़
और पूंजीवाद की सार्वभौमिकता
की पूजा की जा रही है

व्यवस्था
विपणन से विघटन की ओर जा रही है
और मौद्रिक मूल्यों द्वारा प्रदर्शित प्रगति
एवं आर्थिक विकास में लिप्त नीतियाँ
दूर ले जा रही हैं 
व्यक्ति की सोच को
मानवीय मूल्यों से

सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी 
मानो ऐसा मापक हो गया हो
जिसके अभाव में
विकास की परिकल्पना अधूरी हो
भलीभाँति यह जानते हुए कि
जीडीपी और असमानता का सहसंबंध
बहुत पुराना है
सबकुछ अर्थ-केंद्रित
जीडीपी केंद्रित
क्यों हो रहा है

जीडीपी 
विलियम पेटी, एडम स्मिथ और   
साइमन कुजनेट्स 
के माध्यम से यहाँ तक पहुंचते-पहुंचते
अपने मूल रास्ते से 
भटक गई सी प्रतीत होती है  

गरीब की ग़रीबी
और अमीर की अमीरी
जीडीपी केंद्रित नीतियों
का ही परिणाम है, जो
श्रम, तकनीक व उत्पादकता
से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है

बाज़ारवाद पूँजीवाद के साथ बैठा
मना रहा है, अठखेलियाँ
और समाजवाद कराह रहा है
समष्टिवाद पर व्यक्तिवाद
हावी हो रहा है
बदल रही हैं परिभाषाएँ
बाज़ार व वाणिज्य की
सम्बन्धों का बाज़ारीकरण हो रहा है
और गणकों, माणकों व मापकों में
लिप्त बाज़ार
सामाजिक सम्बन्धों को मज़बूत
करने की जगह
मजबूर होने की बन रहा है
वजह

कई बार लगता है
कहीं कोरोना
इस बाज़ारवाद की उत्पत्ति तो नहीं
अपने नियंत्रण को 
और अधिक बढ़ाने की लड़ाई
वर्चस्व बनाने व जताने की लड़ाई
जहां मनुष्य का जीवन दांव पर हो
जहां राष्ट्रों की लड़ाई
अर्थ-केंद्रित हो
और सब कुछ
बाज़ार के इर्दगिर्द निर्धारित हो
वहाँ कुछ भी सम्भव है

बाज़ार का वर्चस्व
ख़तरनाक होते हुए भी
सबको लुभा रहा है
भविष्य को 
और घातक बना रहा है
और सुद्रढ़ सा दिखा रहा है

दिखना, दिखाना और होना
सब बाज़ार केंद्रित हो गया लगता है

हेगेल के ईश्वर पर आज भी
नित्शे हंस रहे हैं
सात्रे मुस्करा रहे हैं
और
नोम चोम्सकी
शक्तिशाली पूँजीवादी व्यवस्था पर
कटाक्ष कर रहे हैं
उत्तर आधुनिक व्यक्तिवादी सोच
समष्टिवाद पर हावी हो रही है
और बाज़ार से निर्मित
पूँजीपति
आज भी उठा रहे हैं फ़ायदा
मज़दूर की मजबूरी का
बाहर की मज़बूती
अंदर की कमजोरी
को और बड़ा रही है

मुझे अकबर इलाहाबादी याद
आ रहे हैं
दुनिया में हूँ 
दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ 
ख़रीदार नहीं हूँ

बाज़ार
बसुधैव कुटुम्बकम् पर आधारित 
समष्टिबाद की
खोद रहा है जड़ें
और न जाने कैसी
उर्वरक यूरिया
इन जड़ों में डाली जा रही है
अच्छी फसल के
बाज़ारू आश्वासनों में सराबोर
आँख मींचे, दांत भींचे
सब कुछ देख रहे हैं
जैसे हमनें देखा है
हरित क्रांति को 
और देख रहे हैं 
उसके दीर्घकालिक प्रभावों को  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता
कृत्रिम तकनीक
कृत्रिम मानव
प्लास्टिक करन्सी
प्लास्टिक मुस्कान
कृत्रिम बाज़ार
कृत्रिम माँग

कृत्रिमता में
घोर रूप से घिरा मनुष्य
कितनी दूर जा रहा है
वास्तविकता व स्वाभाविकता से 
अत्यंत कठिन है
इसकी गणना कर पाना 
सभी मापकों से परे है
इसका गणित

कृत्रिमता के जाल में फ़ंसा मानव
अपनी जड़ों से हो रहा है दूर
और स्वयं से कर रहा है
पलायन
खुद का खुद से पलायन
उसकी ख़ुद्दारी पर
एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रहा है
और यह
एक भयावह भविष्य 
के दे रहा है संकेत 

बाज़ार पूरी तरह मनुष्य में 
कर चुका है प्रवेश
मनुष्य बाज़ारमय हो रहा है
यक़ीन कीजिए
बहुत ख़तरनाक है
आदमी का
बाज़ार हो जाना

Saturday, June 27, 2020

सामान

कितना सामान है
हम सब कितना सामान इकट्ठा कर लेते हैं
कई बार मुश्किल हो जाता है
उस सबको समेटना
उस सबको सहेजना भी
सब कुछ
यात्रा का पाथेय लगते हुए भी
लगने लगता है, बोझ.

सूटकेसों में नहीं सिमट पाता है
वह सब जो ऐल्बमों में रहता है
स्मृतियों में बसता है
एल्बम का एक-एक फ़ोटो
कितनी कहानियाँ कहता है

कितना कुछ सामान
प्रतीत होता है, सिमटता हुआ
परंतु वास्तविकता में
यह सब सामान इतना फैला हुआ होता है
कि हम जीवन भर समेटते रहते हैं
जीवन पर्यन्त इकट्ठा किया हुआ सब-कुछ
(सामान, स्मृतियाँ व अनुभव)

सूटकेस को दबा-दबा कर
भरने से सामानों के बीच लड़ाई होती है
और हम अपने दम्भ में रहते हैं
बिना इस बात को जाने
कि यह सब सामान
मात्र हमारी सहूलियत के लिए है।

Thursday, May 21, 2020

पापा और मैं

उनके रोने की आवाज
और आंसुओं का बहना
मैं सुन व देख रही हूँ
इस अंधकार में
दिनकर उन्हें प्रकाश देते हैं
अपने नाम को चरितार्थ करते हुए
और उनके आँसू
उसकी अभिव्यक्ति है

हम दोनों अलग नहीं हैं
पापा और मैं
हो सकता है अलग हों
हमारे एक दूसरे से
बात करने के तरीके
हमारे माध्यम
क्योंकि हमारी आसक्ति
उन माध्यमों में है
परंतु यह सब
नहीं करता है
अलग हम दोनों को
हमारी आसक्ति, हमारा अनुराग
किसी भी भाषा से परे है

मैं सोचती हूँ
उनकी आँखों के गीले होने के बारे में
उन अश्रुओं के बारे में
जिनका कारण
दिनकर द्वारा रचित
ओज से भरपूर पंक्तियाँ हैं
मुझे रुलाते हैं ईलियट
और वर्जीनिया वुल्फ़
जिस पर सतत् मुस्कराते हैं
रूमी

हम दोनों अलग नहीं हैं
पापा और मैं
हमारा अपना पागलपन है
और उसको हम साझा करते हैं
उस पुरानी किताब की तरह
जिसके प्रष्ठ होते हैं बहुत नाज़ुक
पीले-काले
भीनी-भीनी खुशबू बाले

हजारों-लाखों तरीकों से हम बातचीत करते हैं
शब्द-जाल से परे
शब्द, जो अपने
उपयोग, प्रयोग, व दुरुपयोग की
करते रहते हैं, प्रतीक्षा
एक कोने में बैठकर
सारे अन्तरों को पार करते हुए
भाषा के सभी समंदरों के पार
जैसे यह सारे कवि
रूमी, इलियट और रवि (दिनकर)
बना देते हैं
सूखे समंदर
हमारे गालों पर
और हम कर देते हैं
आत्मसमर्पण
उनके समक्ष
उन्हे प्रदान कर देते हैं अनुमति
हमको उस पीड़ा को देने की
जो आनंददायक है
सभी आँसू बुरे नहीं होते
कई बार वे होते हैं
हमारी प्रेरणा
और बन जाते हैं
अभिव्यक्ति
हमारी आनंददायक अनुभूति की ।


[उपरोक्त पंक्तियाँ, निम्नलिखित कविता का हिन्दी अनुवाद हैं। निम्नलिखित कविता एक बेटी का पिता की आँखों में आँसू (जो दिनकर की पंक्तियों को पढ़ने से उत्पन्न हुए) देखकर मिली प्रेरणा की परिणति]

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In remembrance of the poets I love. Papa being one of them.
dear Dinkar, thank you...

I hear him weep
Dinkar lives up to his name
in the dark air of the present
I hear him weep
my father

we're not too different, my
father and I
separated perhaps by
an attachment to
a mode of communication -
language - is
the least reliable.

I think of his weeping
of the tears that Dinkar gives birth to
of the way the words clench my father's heart -
clench and cling on to
I think of my weeping
of the tears that Eliot gave birth to
of the crying that Rumi smiles back at -
smiles and constantly sticks to

we're not too different
my father and I,
we have our madness - and
we share it like an ancient
copy of a book
with all its yellow
all its smell
and all its fragility

In a million ways we communicate
while words wait in a corner to be used
consumed, and misused. but look
at how we defeat all 'gaps'
all barriers of language
as these poets feed off
the salt etched on our skin
and we present to them
our bare naked selves
with red hearts in our hands
and like Woolf, we yell
"consume me"

एक नई शुरुआत

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

कहाँ से कहाँ आ गए हम
वहाँ से यहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

चार चूड़ी वाली कार को देखता हूँ
जिस पर कुत्ते बैठ रहे हैं
कुत्ते सड़क के शेर हो गए हैं
और हम बन गए हैं घर घुस्सू कुत्ते बिल्ली

घर से बाहर निकलता हूँ
तो पहले मुखौटा लगाता हूँ
एक के ऊपर एक और
मुखौटों को घर पर बनाया जा रहा है
रंग - आकार - प्रकार के अनुसार

बंद हैं, मंदिर - मस्जिद 
मगर शराब की दुकानों के बाहर
बेशुमार भीड़ है
सरकार भी कुछ ऐसा ही चाहती दिखती है

क़ैदी छोड़े जा रहे हैं जेलों से
और नए प्रकार के जेल बनाए जा रहे हैं
पुलिसवाले सड़कों पर खाना बाँट रहे हैं
अर्धसैनिक बल शराबियों को
सीधी लाइन में 
सफेद गोले के भीतर रखने में व्यस्त हैं
और तो और
वे इस प्रक्रिया में संकृमित होकर
अस्पतालों में भरती होने पर विवश हो रहे हैं
कहीं-कहीं पुलिस वाले ताली बजा रहे हैं

डॉक्टर अस्पताल से घर की जगह
होटल में जा रहे हैं
डॉक्टर अस्पतालों में भर्ती भी हो रहे हैं
अस्पताल कर्मी माँ अपने बच्चे से मिल नहीं पा रही है

सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता
कुछ कुछ एक सा बोल रहे हैं
नेता जनता को इकट्ठा होने से मना कर रहे हैं

मज़दूर अपने घर, अपने देस, अपने गाँव लौट रहे हैं
जान की परवाह किए बग़ैर
पैदल, साइकिल पर, रिक्शे पर, ठेले पर, टेम्पो से, टैंकर में भरकर
हर क़ीमत पर, किसी भी तरह
वे घर, अपनों के बीच जाने को आतुर हैं
जान की परवाह किए बगैर
उनकी इस व्याकुलता के समक्ष
भूख ने भी घुटने टेक दिए लगते हैं

अनाज, फल, साग-सब्जी
सब गाँव से आता है
मज़दूर भी
और इन मजदूरों के कंधों पर लदा कोरोना
शहर से गाँव जा रहा है

हम सब भी
कभी ना कभी
किसी न किसी गाँव से क़स्बे में
क़स्बे से नगर और फिर महानगर में
आए थे

पार्क. बाज़ार, सड़क,
स्कूल, कालिज, पुस्तकालय
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
पसरा है सन्नाटा
और घरों में रह रही है रौनक़

यह कैसी बेमौसम बरसात है
उल्टी गंगा बह रही है
सूरज पूरव से उगकर
पश्चिम के रास्ते
फिर पूरव की ओर आ रहा है

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

नीला आकाश दिखाई दे रहा है
पर्वत चोटियाँ साफ लग रही हैं
नई-नई दिखने वाली
विलुप्त होती दुर्लभ चिड़ियाँ दिखाई दे रही हैं
जानवर शहरों में प्रवेश कर रहे हैं

चीन मे बने मोबाइल फ़ोन से
चीन की बुराई हो रही है
विश्वशक्ति माना जाने वाला अमरीका
पूर्णतः त्रस्त है
उसके परमाणु यंत्र आज बेकार पड़े हैं
एक अदृश्य दुश्मन ने
सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है

छुआछूत का नियमतः पालन हो रहा है
हम आगे जा रहे हैं या पीछे

एक विचार है मन में
कहाँ से कहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

किसान अपनी फसलें जला रहा है, बहा रहा है
मेरा देश कहाँ जा रहा है
केवल एक विचार आ रहा है
कहीं यह संकेत तो नहीं है एक युगांत का
एक युग का दुखद अंत
मुझे क्यों ऐसा लग रहा है
कि यह सब संकेत हो सकते हैं
एक नूतन सुबह के
एक सुखद कल के
एक सुदृढ़ भविष्य के

कहीं पढ़ा था
जो चीज आप को चैलेंज करती है
वही आपको चेंज करती है

श्रमिक अपने घर आ रहा है
एक नई शुरुआत करने
यही सुना था
घर से ही होती है
नई शुरुआत
और बड़ी कष्टदायक व हृदयविदारक
होती है यह प्रक्रिया