Wednesday, April 14, 2010

शिलांग मे पंद्रह अगस्त

मैने सोचा भाव कुछ बढने लगे हैं
क्या कहूं अब शब्द भी लड़ने लगे हैं
समय की करवट को देखो आप अब
आदमी से आदमी डरने लगें हैं

फूल काँटों में खिले मंजूर है
दवा जो भी दर्द दे मंजूर है
ज़िन्दगी मे हर समय सुख हो मगर
एक पल भी कष्ट हो तो क्रूर है

रात देखी सन्न है, खामोश है
सड़क, वाहन, चाल सब मदहोश है
देश की स्वतंत्रता का है मज़ाक
स्वप्न आँखों मे मगर मदहोश हैं...

15 August 2006: Shillong: India